पता नहीं क्यों आज एक चिड़िया को देख कर सारा बचपन आँखों के सामने आ गया.वो भी एक साधारण सी गौरैया को देखकर.सच में ये बेशर्म आँखों में आंसुओं ने फिर से जगह बना ली .याद आ गई वो बचपन की शरारत जब डलिया में दाने डाल कर इन बेचारी गौरैया को पकड़ने की असफल कोशिश किया करता था.सारा घर जब दोपहर में आराम करता तो मई इन्हें पकड़ने के लिए उस उम्र के सारे जतन कर रहा होता.....आज वो बचपन फिर तैर गे ..सोचा ज़माने ने हमें कहन से कहन लाकर खड़ा कर दिया की ..अब इन चिड़ियों को देखना भी नसीब नहीं होता......जिस तरह नानी दादी ज़िन्दगी से जाती रही....ये खूबसूरत चिड़िया भी कहीं दूर उड़ गई......अब तो इन्हें देखकर पकड़ने का भी मन नहीं करता बस यही जी चाहता है इन्हें एक उम्र तक सिर्फ निहारता रहूँ...........................सच यही तो मेरा बचपन है कौन इन्हें भूलना चाहेगा.......ये चिड़िया नहीं ये तो बचपन के फ़साने की पारिया. है जो हमेशा याद रहेंगी........सबके भाच्पन की तरह ये भी हमारे बचपन के अकेलेपन की एक शरारती साथी थी.............अगर सुन सकती हो गौरैया तो आज मई तुमसे अपने प्यार का ऐलान करता हु..........
बहुत खूब लिखा ... सच है कि आज ये गौरैया परीकथा की परी की परी हो गयीं हैं... अब तो देखना भी दुर्लभ है... जाने कहाँ गयी ये..
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