हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.
कैसे बोलूँगा तुम्हारे खिलाफ
ये काम भी आँखों को करना होगा
कल तक तुम मेरी थी
न जाने कैसे हो गई पराई
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
कल तक मेरे हाथो में था जादू
आज ये इतने गरीब क्यों.
क्यों तुम्हे मेरी अदाएं
लगने लगी काँटों सरीखी
इसलिए फिर मै बोलता हु
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.
मुझे लिखना है, मत रोको मेरी कलम................
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Deleteअच्छी है
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