मैं रोज़ सोचता हूँ की क्या है जो सुकून से बैठने नही देता।मैं सन्दीप पाण्डेय के बारे में सोचता हूँ।सोचता हूँ यह राजनीति में क्यों हैं।क्या कर रहे हैं।क्या चाहते हैं।मैं उनकी आलोचना करता हूँ तो कभी सराहता हूँ।दोनों ही काम मन में होते हैं।मैं चाहकर भी उनसे उतनी बात नही कर पाता जितने दूसरे कर लेते हैं।कभी कभी दिल करता है कह दूँ की यह रास्ता गलत है तो दिल कहता है यार तुम गलत हो।मुझे पता है वह मुझ पर उतना भरोसा नही कर पाते जितना औरों पर होता होगा।मैं इस फ़र्क को बनाए रखना चाहता हूँ।मैं हमेशा अंध विश्वास से भागा फिर सूफ़ी परम्परा भी कहती है अपने रास्तों को परख लो।मैं देखता हूँ बारीकी से उनके काम को फिर सोचता हूँ।पता नही क्यों एक असमंजस सा बना रहता है।मैं जो फौरन एक फैसले पर आ जाता हूँ वह इतना उलझ कैसे जाता है।मुझे संगठन,पार्टी,सोच इससे कोई ताल्लुक़ नही।उस शख्स का जूझना और जूझने में अक्सर जो हार होती है वह हार मुझे हौसला देती है।मुझे लगता है वह इंसान ही हैं।मैं देवताओं, सन्तों से इतर इंसान को ज़्यादा करीब पाता हूँ।सन्दीप जी के पास हमसे बहुत अच्छे बहुत से लोग हैं और हमारे पास वह हैं जिनकी मैं तारीफ भी करता हूँ और आलोचना भी।आलोचना इस लिए क्योकि जिसकी आलोचना न हो वह मर जाता है।मैं उनको कभी मरता हुआ नही देखना चाहता।बस एक ख्वाहिश है उनके प्रयोग आने वाली पीढ़ी में पहुँचे।मेरी ख्वाहिश है वह एक देश का पूरा ख़ाका लिखें जिसमे सब तरह केविचार हों।एक साँचा हो,जो वह ही बना सकते हैं इस दौर में।राजनीती,संगठन और विचार में हम बराबर साथ और टकराहट दोनों होते रहेंगे।वो जिस रास्ते पर हैं मैं उसे देख पा रहा हूँ।शायद कभी हिम्मत हो तो मैं भी चलू।आपको लग रहा होगा यह क्यों लिखा गया।सिर्फ इस लिये की अगर कोई संशय आए या दिलचस्पी आए तो संदीप को देखो,पढ़ो और अपने रास्ते बनाओ।वह गुरु से अच्छे दोस्त हैं और बहुत बार दोस्त गुरुओं से ज़्यादा सिखा जाता है।हाँ इतना है हम एक धागे से बंधे हैं वह आसमान तक उड़ गए उस धागे से और हम आज भी पतंग उड़ाने वाले के हाथों में उलझे हैं।
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