Tuesday, May 10, 2016

मंटो

मंटो तुम कितने बदतमीज़ हो।कैसी कैसी कहानिया लिखते हो।खैर छोड़ो, चलो लिखा करो।पढ़कर मज़ा आता है।कितना मज़ा आता है जब दिल में सैकड़ो तीर एक साथ चुभते हैं।बड़ा अच्छा लगता है जब ज़मीर पैरों से कुचला जाता है।कितना अच्छा लगता है जब नाली की खुशबु दिमाग को सड़ा देती है।अच्छा मंटो तुम्हे ठंडा गोश्त याद है, अर्रे वही जो तुमने आवारगी में लिखी थी।दोस्त सैकड़ों जाँघो पर पैर रख चुका हूँ मगर वह ज़ायका नही आया।अब तुम हमेशा की तरह काली शलवार न लेकर बैठ जाना।तुमने तो लिखा है, हमने तो दंगों में काली,पीली,नीली,हरी सब शलवारें देखी हैं।इतनी शलवारो पर तो मंटो भी नही लिख सकता और मैं कोई मंटो तो हूँ नही।अच्छा एक बात बताओ मंटो तुमने सबपर लिखा है मगर बच्चों को क्यों छोड़ दिया।बच्चों की उतरती नेकर और हवस से मसलते बचपन को क्यों नही लिखा।अच्छा,तो तुम बड़े थे,तुम झुक कर बच्चों के लिए कहाँ लिख सकते थे।और क्या,आखिर मंटो ने क्या ठेका ले रखा है सब पर लिखने का।वैसे भी तुम अब कहाँ लिख सकते हो।तुम तो कबके मर चुके हो,मंटो मर चुका है।हाँ एक शराबी मर चुका है।वह ऐसा शराबी था जिसके मरते ही शराब ने अपना अदबी मज़ा(साहित्यिक स्वाद) छोड़ दिया।आज तुम्हारी सालगिरह है मंटो,तुम बेहद याद आ रहे हो।आज तुम मेरी चाय में उतर आओ मेरे दोस्त।अच्छा ठीक है आज हम और तुम एक साथ चाय पीते हैं।वाह क्या इत्तेफ़ाक़ है तुम्हारे पास शराब के पैसे नही होते और मेरे पास चाय के रूपये नही होते।चलो कोई तो दो आवारो को चाय पिला ही देगा,वैसे भी मिसकीन से हमारे चेहरे बड़े काम आते हैं।लो पियो चाय,मंटो।

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