Thursday, May 12, 2016

आशिकी द्वतीय

तुम गाना गा रही हो?अच्छा वह वाला गाओ न।जो उस दिन कालेज की सीढ़ियों पर गा रही थीं।जिसके लफ्ज़ मेरे कानों में आज भी गूंज रहें।तुम्हे याद है हमने सैकड़ों क्लास सिर्फ अपना क्लॉस मेंटेन करने में बंक की थी।तुम्हारे अल्लामा इक़बाल जैसे अड़ियल शायर बाप के लिए दो सौ शेर याद किये थे,फिर भी उन्होंने कह ही दिया था यह तुमसे,कहाँ फंस गई बेटा।तुम तो जानती हो आइंस्टीन का फार्मूला याद करने में मुझे 6 महीने लग गए थे जबकि शेर दो हफ़्तों में।कितना फ़र्क था हममे और तुममें।मैं वही हिंदी वाला मूँगा और तुम उर्दिश वाली याक़ूत।मैं इसे इश्क़ तो नही कहूँगा,न समझूँगा।इसे तो मगरूरियत की फक्कड़पन के आगे शिकस्त कहूँगा।इश्क़ होता तो आज कुछ और होता।मज़ा तो तब आया जब तुम्हारे सिगार वाले अब्बा तो तैयार हो गए मगर मेरे बीड़ी वाले अब्बा का फटीचर खानदान सामने आ गया।वह खानदान जिसने हमेशा ही अब्बा को फेहरिस्त में इतने नीचे जगह दी की अगर कलम ज़रा से फिसलती तो वह मुगलिया खानदान से बाहर हो जाते।फिर भी बालक बीड़ी के धुंए से भरी अब्बा की खानदानी नाक ने तुम्हारे शेरवानी खानदान को मना कर दिया।तुम भी तो किमाम की सैकड़ो गोलिया खाकर काफ़ूर को जिस्म से मल बैठी।तुम अल्लामा को,हमको,दुनिया को छोड़कर उस गाने की धुन बन गई जो आज तुम गा रही हो।तुम्हारे जाने के बाद मैं तब तक इस धुन में रहूँगा जब तक कोई दूसरी धुन मुझमे घुन नही लगा देती।।। ©

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