फ़र्ज़ी क्रांतियों में नए लोगों को मत फसाइये।अक्सर ज़्यादातर संगठन नए नौजवानों को जोड़ता है, उनको क्राँति का झूठा सीरियल दिखाता है फिर एक दिन यह झूठ चरमरा कर बैठ जाता है।भृष्टाचार की ख़िलाफ़ दुनिया का तमाशा होता है और आखरी में खुद भृष्ट होकर गुम हो जाते हैं।राजनीती में तो कई पीढ़िया बर्बाद हो गई।नास्तिकता का जमकर प्रचार होता है और अंत में माँ बाप के क्रियाकर्म के साथ यह भी बैठ जाता है।बात यह नही है की आप किस विचार के साथ कितना चले,बात यह है की आपने अपने भुरभुरे विचार में कितने नौजवानों को बर्बाद कर दिया।अक्सर देखता हूँ दो या तीन या बहुत पाँच सालों बाद यह क्रन्तिकारी नौकरी,पैसे,प्रतिष्ठा पाने के लिए तड़प उठते हैं।फौरन ही निकल जाते हैं विलासिता के रास्ते पर,यह भी बुरा नही है।बुरा है नौजवानों को अपने मकसद की सीढ़ी बनाना।जिस उम्र में यह खूबसूरत दिमागों के नौजवान विज्ञान, गणित,कला,चिकित्सा,इंजीनियरिंग में दुनिया में परचम लहराते उस उम्र में इनसे संगठनो के झंडे और गला फाड़ कर नारेबाजी कराई जाती है।हो सकता है यह बहुतों को बुरा लगे मगर मेरे लिए समाज सेवा थोड़ा अलग है।मेरे लिए क्राँति अलग है।मैं किसी भी नौजवान को ख़ाली, भटकते हुए नारेबाजी करते नही देख सकता।मुझे उस नौजवान के पीछे एक उम्मीद की टिकटिकी बाँधे परिवार दिखता है।मैं हर उस लीडर की मुखालफत करता हूँ जो बेज़रूरी कामों में नौजवानों को लपेटे है।इस वक़्त लाखों नौजवान परेशान है उसे खुद मुश्किल से लड़ना सिखाइये,उसे हौसला दीजिये,उसमे स्किल बढ़ाइए,उसे रोज़गार दीजिये ताकि उसका घर,परिवार चल सके।हाँ अगर त्याग करने वाला कोई नौजवान आगे आए बिना लालच या ख्वाहिश के तो यकीनन उसे किसी लीडर की ज़रूरत नही।नौजवानों से इतना कहना है की खूब पढ़ो,मेहनत करो और अपने नेता,संगठन,समाज को पहचानों, अपना वक़्त देखो और सोचो भारत दस साल बाद कहाँ होगा,तब तुम कहा होंगे और यह संगठन कहाँ होगा।जब सब दिखने लग जाए तब आगे बढ़ो।दलों,संगठनो से बस इतना की किसी नौजवान के सबसे कीमती वक़्त को मत खराब कीजिये,उसे सिखाइये और आगे बढ़ाइए यही आपका फ़र्ज़ है।जो अपना रास्ता खुद चुनें, दिल से,बिना बहके,बिना किसी से प्रभावित हुए,सिर्फ बदलाव के लिए,उनके लिए कोई सलाह नही।वह रास्ता हमसे बेहतर जानते हैं। ©
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