Thursday, May 19, 2016

ग़म ए दिल

बड़े से हॉल में पाकिस्तान और हिंदुस्तान के सूफ़ी सन्त इकठ्ठा थे।बहुत दिन बाद मिलने से हॉल रोने,मिलने,शिकवे की आवाज़ों से गूँज रहा थे।तभी पाकिस्तान के कलन्दर बाबा दाखिल हुए और शिकायती अंदाज़ में कहा निजामुद्दीन यह क्या है, तुम आज तक मुल्कों की सरहद तक नही खत्म कर पाए।निज़ामउद्दीन भी सकपका गए और बोले कैसे खत्म करें, आपकी तरफ वाले भी तो नाक में दम किये हैं।मेरे खुद के मुरीद नही आ पाते।तभी करतारपुर,पाकिस्तान का चमकता हुआ रथ आया।उससे उतरे गुरु नानक देव।एक साथ सबने उनको सलाम किया और सभा शुरू हुई।ज़र्रे ज़र्रे,पहाड़,मैदान,मौसम,झगड़े,मोहब्बत सब पर ढेरों बातें हुईं।पूरे जलसे के बाद सूफ़ियों की आँखे सूजी थीं।आँसू सूख चुके थे।वह कह रहे थे दोस्तों हम तो कभी भी कहीं भी मिल सकते हैं, मगर मेरे बच्चे,मेरे मुरीद वह कितनी दूर हो गए हैं।हम जिन्होंने सरहद,मुल्क़ कोई बन्धन नही माना हमारे बच्चे इसमें जकड़ गए हैं।निजामुद्दीन बाबा फ़रीद से रोकर कह रहे थे सोचो फ़रीद तुमसे मिलने के लिए मेरे बच्चे को वह कागज़ के टुकड़ो का सहारा लेना पड़ता है जो हमारे दरबारों में टिकता न था।मेरे बच्चे जब रोते बिलखते आते हैं तो गुरु नानक की छाँव भी उन्हें नसीब नही होती।इतनी दूर बैठकर जब तुम्हारे किसी बच्चे से मेरा मिलने को दिल करता है तो यह सरहद,वीज़ा और न जाने क्या क्या उसे रोक देता है।इन्हें कौन बताए की पीर की तड़पन क्या है।मुर्शिद की प्यास क्या है।मोहब्बत क्या है।सुकून क्या है।तभी गुरु नानक बोल उठते हैं।मुझसे पूछो,करतारपुर में बैठकर मैं उन दिलों को महसूस करता हूँ जो मेरी आरामगाह को देखना चाहते हैं।हम सब परेशान हैं मगर सोचो हमारे बच्चे कितना परेशान होंगे।वह कितना तड़पते होंगे और थक कर मायूस होकर बैठ जाते होंगे।हम सब तो सरहद से परेशान है, अब तो हमारे बच्चों के दिलों में सरहद है।दिमाग में सरहद है।वह एक दूसरे को देखना नही चाहते।बर्दाश्त नही करते।इन्होंने तो हम सबको बाँट दिया है।अब फ़रीद मुसलमान और नानक सिख हो चुके हैं।बस देखते रहिये।बिना रोए अपने बच्चों की करतूतों को बर्दाश्त करो निज़ामुद्दीन।नीब करौरी और तुलसी तो इतने दर्द में थे की आए ही नहीं। ©

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