देखिये मज़ाक नही कर रहें, वाक़ई लोकपाल बेहद ज़रूरी है।हम तो लोकपाल की महिमा से ओतप्रोत हैं।यह बिजूका को भी लौहपुरुष बनाने की ताकत रखता है।खाली इस शब्द भर ने देश को कथित दूसरे गाँधी से मिलवाया।ऐसा गाँधी जो सारेगामा सीरियल तक पहुँच गया इसकी शपथ दिलाने,अब पता नही कहाँ गायब हैं।अब रहे दूसरे केसरिया व्यापारी,बेचारे लोकपाल लोकपाल करते खरबपति हो गए,इतने मासूम की खरब में आने वाले शून्य भी नही मालूम उन्हें।अब आते हैं मिस्टर कफ़, लोकपाल और खाँसी ने उन्हें लुटियन में बिठा दिया,अब पता नही लोकपाल चचा इनके ख्वाब में आते हैं की नहीं।एक और रह गए।इस पूरे सीरियल के स्क्रिप्ट राईटर,वो कौन हैं जिनकी ज़बान से मधुमक्खी को भी जलन हो जाए।अरे वही जिन्हें मिस्टर कफ़ ने लुटियन में खाली लोटा दिखा दिया था।जो लुटियन से गाते हुए निकले थे"बड़े बेआबरू होकर सनम तेरे कूचे से हम निकले..."पता नही कहाँ निकल गए,कहीं गन्ना ही उगा रहे होंगे शायद।अब सुनिए वीर,प्रतापी,साहसी,निडर,यशस्वी महिला के बारे में।अरे रहन दे।अब उन महिला का नाम तो हरगिज़ नहीं लूँगा जो जंतर मन्तर पर झंडा लहराती हुई पांडिचेरी पहुँच गई।अमरीका से गढ़ी पीर खान तक लम्बी दास्ताने हैं लोकपाल महिमा और रेवड़ी बाँटने की।खैर लिखने को तो पूरा लिखा जा सकता है मगर हम शेक्सपियर को पछाड़ने के मूड में नही हैं दोस्त।सबका अपना अपना लोकभाग्य।लोकपाल तुम वाक़ई ज़बरदस्त ऊर्जावर्धक हो।शतरंज के सारे प्यादे हमारी आँखों के सामने फिट हो गए।खेल वाक़ई मज़ेदार था।आईपीएल से भी ज़्यादा।मज़ा आ गया।वैसे चुपके से यह भी सुन लो,सोशल मिडिया पर गरियाने वाली संस्कृति भी लोकपाल के दौर से ही ज़्यादा शुरू हुई थी जिसकी ज़द में आज सारे के सारे हैं।वह सरकारें आँख खोल कर देख ले जो लोकपाल लाने से डर रही थीं, सरकार जाने दी मगर लोकपाल नही लाई।देखो अब वाले कितना क्यूट सा लोकपाल रखें हैं।सल्ट्यूट डियर लोकपाल।मान गए डियर लोकपाल।लॉन्ग लिव लोकपाल। ©
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