राजनीती में बदला नही लिया जाता बल्कि गुरुर तोड़ा जाता है।शिकस्त दी जाती है।अगर बदला लिया जाता तो बहुत से नेता जेल में होते।बहुत से सूबे से बाहर जँगल में भागे भागे फिर रहे होते।अवाम को लगता है उनका सुपर हीरो जब आएगा तो चुन चुन के बदला लेगा।वह अपने नेता में धर्मेन्द्र के खानदान को देखता है।मिथुन को देखता है।मगर उसके नेता इस पर कान भी नही धरते।यहाँ तक सबसे अपरम्परागत राजनीती में माहिर मायावती ने भी मुलायम को गेस्ट हॉउस काण्ड के लिए सज़ा नही दी।बदला नही लिया,हाँ गुरुर खूब तोड़ा।बढ़िया लगता है देख कर की यह आग उगलती ज़बाने ,दिमाग का खूब इस्तेमाल जानती है।आपस में ज़बरदस्त कूटनीति के बावजूद बदला नीति से सभी ने किनारा किया हुआ है।सबसे ताज़ा उदाहरण केजरीवाल हैं जिन्होंने शीला दीक्षित से किनारा कर इस परम्परा को आगे बढ़ाया है।ममता,जयललिता नितीश,लालू सबने इस परम्परा को सींचा है।मोदी जी भी मैडम सोनिया ही करते रहे उससे ज़्यादा कुछ नही किया।खैर यह अच्छा भी है।वैसे भी यह सबके सब मेरे लिए ज़बरदस्त इंटरटेनमेंट हैं।सबको राजनीती के मंच में देखना किसी थियेटर से कम नही है।सबको देख कर अभिनय को समझना और नम्बर देना आसान लगता है।भाँति भाँति के नेता,अलग अलग तरह के हुनर से मोहित करती है।वैसे भी हमे बदला लेने वाले पसन्द नही।हमारे देश की राजनीती आज भी गाँधी के एक आदर्श को थामे ही है,वह है बदला न लेना।मगर दूसरा रास्ता हमारी सियासत का मेड इन इण्डिया हथियार है, गुरुर तोड़ना।वैसे भी रही बात गुरुर की तो गुरुर कभी सगा नही हो सकता।इससे बेवफ़ा कोई नही।मौके पर इसका टूटना ही इसका जीवन है।मुझे भारतीय राजनीती का यह अनूठापन बहुत भाता है।सियासत से सीखिये ,उत्तेजना आपको जलाएगी और सियासत आपको जिलाएगी। ©
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