क्या तमाशा है।अपने ही लोगों के साथ धोखा।अफ़सोस होता है इनको देख कर।एक ट्रेन भेजी गई पानी की।लगा कितनी फिक्रमन्द हैं हमारी सरकारें।बस फिर क्या बीच में अवतरित हुई राजनीती और ट्रेन को यूपी में लेने से मना कर दिया गया।अब देखिये दूसरी कारीगरी।पूरी ट्रेन ख़ाली थी,उसमे पानी ही नही था और केंद्र-राज्य भिड़े रहे पूरा दिन।पूरी ट्रेन खुद बुन्देलखण्ड की तरह सूखी थी।दोनों सरकारों ने अपनी जनता को खूब तमाशा दिखाया।अफसोस है एक ख़ाली, सुखी ट्रेन को जल दूत बना कर भेज कर भद्दा मज़ाक किया गया।शर्म नही आती है ख़ाली प्लेट और सूखे खेत देख कर।जिनकी हलक तक खाना भरा है और नाक तक पानी उन्हें तो यह पहले ही नही दिखेगा।जब एक एक आदमी राजनितिक गुलाम हो जाए तब इंसानियत का एहसास सबसे पहले दम तोड़ती है।हमारी सूखी ज़मीन से ज़्यादा इन नेताओं की आँखे सूखी हैं।अगर यूपी की सरकार में राजनीती दिखती है वह ज़रा महाराष्ट्र की भी सियासत को झाँक ले जिन्होंने दिल्ली का पानी लेने को मना कर दिया था।जब हमने फड़नवीस पर सवाल नही उठाए तो अखिलेश पर क्या कहें।गलत दोनों हैं।वैसे भी सूखा हमारे घरों में पड़ा है यह सफ़ेद वायसराओं के घर तो इंद्र देवता अपना मूल निवास पहले ही बनाए हुए हैं।
सारे के सारे झूठ बोल रहे,धोखा दे रहे हैं,तमाशे कर रहे हैं और हम उनकी बजाई धुनों पर भक्ति और ग़ुलामी के साथ गा रहे हैं यहाँ सब मस्त-मस्त है....
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, May 5, 2016
बंजर आँखे
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