Tuesday, May 31, 2016

शरारत

किसी पत्थर को लात मत मारो हो सकता है कोई अहिल्या अपने राम की ठोकर का इंतज़ार कर रही हो।यह ख्याल तब आया जब स्कूल से घर पैदल जाते हुए दिल को बहलाने के लिए हम एक पत्थर के टुकड़े को मारते मारते घर लाते थे।इत्तेफ़ाकन एक दिन ज़मीन में गड़े पत्थर पर ठोकर मार दी।पैर में ज़बरदस्त चोट पहुँची एकाएक अहिल्या वाला किस्सा याद आ गया की कैसे वह सैकड़ो वर्ष राम जी ठोकर की बाट जोहती पत्थर बनी रही।पत्थर में अहिल्या का मायूस मासूम चेहरा दिखने लगा।लगा जैसे यह पैर पत्थर पर नही किसी श्रापित महिला पर पड़ गया हो और बदले में उसने उस मगरूर पैर को उसकी औक़ात दिखा दी हो।अंगूठे से बहते खून ने बता दिया की राम कितने महान थे और हम कितने बेईमान।दिल तबसे हर पत्थर के लिए नरम हो गया।सोचने लगा,यह तो अहिल्या जैसी महान औरत के किस्से थे जो बाहर आ गए।उस दौर में और भी औरतों को हो सकता है ऐसे अभिशाप दिए गए हों।हो सकता है किसी के पति ने ज़्यादा सख्त शॉप दिया हो की यह आज भी पत्थर हों।बेचारी आज भी पत्थर बनी हुई हैं।ख़ामोशी से किसी युग पुरुष की ठोकर की बाँट जोह रही हैं।बेचारी।खैर दिल है वह कहीं भी जा सकता है।दिमाग है कुछ भी सोच सकता है।बस मुझे अहिल्या को सोचकर तरस आया और इन पत्थरों को ठोकर मारना बन्द।वैसे यह अपने आप  को बहलाने के लिए किस्सा दिमाग ने खुद गढ़ डाला वरना ठोकर खाने से चोट बहुत तगड़ी आई थी।खून निकलने लगा था।मगर अपनी हर बुरी हरकत को तो सद्कार्य में बदलना था तो दिल ने पत्थर में अहिल्या देख ली।कमबख्त दिल कितना फरेबी होता है।इस दिल में इतनी स्क्रिप्ट पैदा हो जाती हैं की यह गोश्त का लोथड़ा पूरी एक नावेल बन जाता है।किसी दिन इस दिल को थियेटर के स्टेज पर लेजाकर पटक देंगे,सारी ड्रामेबाज़ी वही दिन बाहर आ जाएगी।©

No comments:

Post a Comment