उस शाम अपनी प्रैक्टिकल की कॉपी उसको दे दिया सिर्फ इसलिए की वह खुश हो जाए।मुझे लम्बे वक़्त तक नही पता था की मैं उसे खुश क्यों देखना चाहता हूँ।घर आने पर भी बार बार उसका ही नाम ज़बान पर आ जाता था।याद है नए लगे बेसिक फोन पर घन्टो बात होती मगर बेवजह की।मैं ज़रूरत से ज़्यादा खुश रहने लगा था।कहते हैं पेड़ बोलते हैं कसम से हमने तो उन दिनों पत्तियों की भी आवाज़ें सुनी थी।सब कुछ अच्छा लग रहा था फिर भी नही पता था की यह क्या है।मैंने हर वह फ़न अपना रखा था जिसमें उसे मज़ा आता था।अब समझ आता है वह इश्क़ था।जब उसने कहा भी तब भी मैं बेवक़ूफ़ की तरह नही समझा।जब समझा तब तक वह एक बच्चे की माँ होकर दुनिया को भी छोड़ गई।मुझे इश्क़ नही पता।अगर किसी के साथ खुश रहना इश्क है तो मैंने किया है इश्क।अगर पार्कों में घूमना,फ़िल्म देखना,एक कप में चाय पीना,बिला वजह दिमाग में किसी का ख्याल आना, उसकी तस्वीर देखते रहना इश्क है तो मैं इश्क में था।क्या करें जब कुछ समझ में आए तो समझ भी जवाब दे देती है।आज भी घूमना,पढ़ना,चाय साथ मगर बिल्कुल अकेले।दिल में कभी कभी कोई दस्तक दे जाता है फिर भी उस वक़्त उसी वक़्त की तरह दिमाग तेज़ चलने लगता है और दिमाग ऐसी एडिटिंग करता है की उस दस्तक का वजूद भी खत्म हो जाता है।देखते हैं कभी कोई दस्तक एडिटिंग को हरा भी पाती है या नहीं।तब तक मैं नशे में हूँ।चाय के नशे में।
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