Wednesday, May 4, 2016

डिग्री डिग्री

तुमने हफ़्तों बेकार कर दिए गैर ज़रूरी मसले में।तुम उसकी डिग्री में उलझे रहे तो कभी टोपी में।तुम कभी उसकी चाय में उलझे रहे तो कभी उसकी फिसलती ज़बान में,मगर भूल गए की वह इन सबसे बहुत आगे है।सब जितना चाहें ऊधम मचा ले इतिहास में वह दर्ज हो चुका है तो अब अपने रास्ते भी तय करलो।फ़ालतू के सवालों में साल काटना है या अवाम की ज़रूरतों की बात करनी है।उसकी इतिहास विषय की कमियाँ ढूंढना है या उसकी ऐतिहासिक कमियो पर बात करनी है।उसकी डिग्री देखने से ज़्यादा अहम था डिग्री वालों के रोज़गार के बारे में पूछना।महँगाई पर घेरना।पनामा पेपर्स में ख़ामोशी पर घेरना।मरते किसानों की डूबती आँखों के सवाल करना,बढ़ी हुई फ़ीस पर बात करना।मगर नहीं, मज़ा तो खुराफातों में आता है।जो मज़ा डिग्री डिग्री खेलने में है वह बुनियादी चीज़ों में कहाँ।।अभी वक़्त है लोगों में उतरो,उनकी तकलीफो को देखो,उनकी आवाज़ बनो।तब तो अवाम अपना लेगी वरना करते रहो बेज़रूरतो के बातें।कुछ साबित नही कर पाओगे।हाँ इन बिलावजहों की बातों से अवाम के दिल से ज़रूर उतर जाओगे।अवाम देखती है तुम उसकी ज़रूरतों पर फिक्रमन्द हो या तमाशों में।विरोध उसी दिशा में सही है जहाँ वह जनता के लिए,मुल्क़ के लिए हो नाकि अपनी खुन्नस से हो।आप उसके ज्ञान में ढेरों कमियां निकाल सकते हैं मगर उसकी कला के आगे सब ढह जाएँगी।मैं चाहता हूँ की उसकी जवाब दे ही तय हो।बेरोज़गारी,किसान,सूखा,महँगाई, भड़काऊ बयानबाज़ी,नफ़रत,पडोसी देशो से सम्बन्ध,चीन की बढ़ती। ताकत और हमारी कूटनीतिक चूक, भृष्टाचार,घोटाले सब पर उससे बात हो।सवाल हों।प्रदर्शन हो।ताकि अवाम भी समझे कौन कितना फायदेमंद है।दोस्त अगर चोट सही जगह की जाएगी तो उसका असर होगा वरना सिर्फ आवाज़ ही आएगी।मेरे लिए मुल्क़ अहम है व्यक्ति नही।मुल्क़ की बात करिये,यह लोग आते जाते रहेंगे मगर यह देश ऐसे ही चलता रहेगा इसकी फ़िक्र कीजिये।पार्टी,संगठन,सोच,जाति, धर्म  से इतर मुल्क़ के बारे में सोचिये।बस।।

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