Wednesday, June 15, 2016

एक पूरा युग देखा है हमने।

हिंदी साहित्य के एक युग का अंत।।

"यार मुझे मत बुलाओ प्रोग्राम में,तुम मेरी तक़लीफ़ तो समझते हो।अगर वाक़ई ज़रूरी हो तो कहो आ जाए।"यह वह लफ्ज़ थे जो आज से हमेशा कानों में गूँजेंगे।अब इन अल्फाज़ो को बोलने वाला कभी नही बोलेगा मगर उनका लिखा हर लफ्ज़ तब तक बोलेगा जब तक यह दुनिया रहेगी।मुझे बचपन से याद है सहारा अख़बार में उनका कॉलम निकलता था।सब कुछ देखे बिना सीधे उनपर नज़र पड़ती और एक साँस में उन्हें पूरा पढ़ जाना।फिर वक़्त गुज़रा उनसे मुलाकात हुई।लगा ही नही की वह इतना बड़ा लेखक हमारे सामने हैं,धीरे धीरे रिश्ते बढ़ते चले गए।जिस कैफ़ी अकेडमी में मैं हूँ उसी के बड़े कद में वह थे।कभी पाठक रहा तो यहाँ वह अभिभावक हो गए।इतना सादा मिजाज़ इंसान पहले कभी नही देखा था इसलिए एक अजब छाप सी दिल पर पड़ गई।अब जब वह शख्स चला गया है तो इतना लिखने का दिल है की यह अवध की ज़मीन भर जाए।इसके ज़र्रे ज़र्रे से मुद्राराक्षस मुद्राराक्षस आवाज़ आए।मुझे हमेशा फ़ख्र रहेगा की हमने मुद्राराक्षस को देखा है।उनसे सीखा है।उनके सामने लिखा है।यह फ़ख्र उन सबको होगा जिन्होंने इस महान कलम को देखा है।आज मैं बिलकुल नही रोऊंगा,बिलकुल नही मायूस होऊँगा, बिलकुल नही घबराऊँगा क्योकि आज मुद्राराक्षस अपने जिस्म से आज़ाद होकर हम सबमे घुल गए हैं।उनके साथ बीता हर पल रौशनी है हम सबके लिए।आइये आज अपने आप से वादा करें की हालात चाहे जितने विपरीत क्यों न हों, हम अपनी कलम न रोकेंगे,न तोड़ेंगे,न झुकने देंगे,क्योकि हम मुद्राराक्षस को देख कर लिखने वाले लोग हैं।
कलमकार सुभाष चन्द्र उर्फ मुद्राराक्षस का जन्म 21 जून 1933 को लखनऊ के बेहटा गांव में हुआ था। उनके पिता शिवचरणलाल प्रेम उत्तर प्रदेश के लोकनाट्य और नौटंकी के उस्ताद थे।
हिन्दी साहित्य में हमेशा अपने विद्रोही तेवर और निराले अंदाज़ और बहुमुखी प्रतिभा के लिए पहचाने गए मुद्राराक्षस लखनऊ के हिन्दी साहित्य के सबसे वरिष्ठ स्तम्भ थे।भगवती बाबू ,नागर जी और यशपाल की तिकड़ी के लिए मशहूर ये शहर श्रीलाल शुक्ल,केपी सक्सेना और कामतानाथ से पहले ही ख़ाली हो चुका था और अब इस सिलसिले का एक और चिराग़ बुझ गया।
मुद्राराक्षस में साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरुचि अपने पिता के करीब रहकर ही जागी। यही वजह है कि कम उम्र से ही वे नौटंकी की बारीकियों को समझने लगे और किशोरावस्था से ही उन्होने नौटंकी में नए प्रयोग भी शुरू कर दिए।इसी दौर में साहित्य ने भी उन्हे मोह लिया और एक के बाद एक रचनाओ से मुद्राराक्षस अपनी कलम की चमक बिखेरने लगे।
1955 में 22 साल की उम्र में लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए कियाए वो भी गोल्ड मेडल जीतते हुए।उसी साल कलकत्ता से उन्हे ज्ञानोदय के सहायक संपादक की नौकरी के लिए बुलावा आ गया।उन दिनों लखनऊ जैसे छोटे शहर के किसी भी मामूली नौजवान के लिए ये एक ग़ैर.मामूली बात थी।
मुद्राराक्षस ने कलकत्ता जाकर ज्ञानोदय ज्वाइन किया।इसके बाद से उनकी प्रतिभा धीरे धीरे अपनी पहचान बनाने लगी।ज्ञानोदय में मुद्राराक्षस 1958 तक रहे।इन सालों में उन्होने अपने नाम को इतना पक्का कर लिया कि 1959 में अनुब्रत के संपादक हो गए। यहां भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा को खूब पहचान मिली।
1976 में उसूलों की लड़ाई पर उन्होंने रेडियो की नौकरी छोड़ी तो जि़ंदगी में कभी नौकरी न करने का फैसला किया।1962 में वे ऑल इंडिया रेडियो में स्क्रिप्ट एडिटर नियुक्त हुए थे।रेडियो में रहते हुए उन्होने इस मीडियम के लिए तो उत्कृष्ट काम किया ही साथ ही साहित्य सृजन भी चलता रहा।
नौकरी के साथ ही दिल्ली को छोडक़र लखनऊ वापस आ गए यहाँ जि़ंदगी बतौड़ स्वतंत्र लेखक आगे बढ़ने लगी।उन्होंने 16 नाटकों का निर्देशन किया,15 से ज्यादा नाटक लिखे जिनमें 9 छपे,12 उपन्यासए 5 कहानी संग्रहए 3 व्यंग्य संग्रह और आलोचना की 5 किताबें छपीं।ये दीर्घ विवरण सबूत है कि मुद्राराक्षस की साहित्यिक प्रतिभा कितनी विराट और बहु.आयामी थी।यही वजह है कि राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादेमी अवॉर्ड,उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड,उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान,अम्बेडकर महासभा का दलित रत्न सम्मान, शूद्र महासभा का शूद्राचार्य सम्मान,कैफ़ी आज़मी अकेडमी का कैफ़ी अवार्ड समेत बेशुमार सम्मान उनको मिले।
मुद्राराक्षस हमेशा से विद्रोही रहे।शुरू से लेकर आखऱि तक मथुरादास की डायरी और राक्षस उवाच जैसे अपने अनूठे व्यंग्य संग्रहों में उन्होने हिन्दी जगत की ऐसी ख़बर ली कि एक हंगामा खड़ा हो गया।ये व्यंग्य जब अख़बारों में छपे तो कई बार नौबत यहां तक आ गयी कि दफ्तर पर पथराव हो गया और संपादक को माफी मांग कर क़ॉलम बंद करना पड़ा मगर मुद्राराक्षस अपनी जगह अटल रहे न माफी मांगी न डरे।बराबर लिखते रहे फिर हिन्दू धर्मग्रन्थों को जी जान लगाकर खंगाला और उसके बाद धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ जैसी चर्चित किताब लिखी।
अपने निधन के कुछ ही साल पहले लखनऊ की मशहूर तिकड़ी नागर,भगवती बाबू और यशपाल के सम्मान में आयोजित एक बड़े प्रोग्राम में मंच से बोल आए कि अमृतलाल नागर तीसरे दर्जे के उपन्यासकार थे और उनके उपन्यास विश्व साहित्य के बड़े उपन्यासों के आगे कहीं नहीं ठहरते उनके मुताबिक नागर उपन्यास के बजाए पुरातत्व में हाथ आज़माते तो बेहतर था।
ग़ौरतलब है कि नागर जी ने अपने सबसे मशहूर उपन्यास बूंद और समुद्र का डिक्टेशन मुद्रा को ही दिया था और बकायदा किताब की प्रस्तावना में उनका जि़क्र किया था जैसे ही नागर जी के लिए वो बयान मुद्राराक्षस के मुंह से निकला एक बवंडर सा हो गया साहित्य जगत में।सभागार में उनके ख़िलाफ नारेबाज़ी शुरू हो गयी।कुछ लोग तो सीधा आक्रामक अंदाज़ में चिल्लाते हुए मंच की तरफ चले आए।सब घबराने लगे।मगर मुद्रा मुस्कुराते रहे और हल्के स्वर में बार बार दोहराते रहे मुझसे तर्क करो मैं बताऊंगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं।नारे लगाने वालों में से किसी ने उनसे बहस नहीं की क्योंकि मुद्राराक्षस से तर्क और बहस करने की हिम्मत लखनऊ तो क्या देश भर में कम ही लोग जुटा पाते थे।
आखिरी वक्त में कमज़ोरी के बावजूद वे देश और दुनिया का जितना साहित्य पढ़ते थे वो हैरत में डालता है मज़ूबत इरादों के अडिग व्यक्ति थे।
सारे लोगों ने हमेशा उन्हे वैसा ही देखा था जैसा वो अपने बारे में बता रहे थे।मगर एक दिन जब उन्हें पहली बार अपने कमज़ोर पडऩे का एहसास हुआ। तभी इर्द गिर्द मौजूद लोगों को भी ये अहसास हुआ कि मुद्राराक्षस भी कमज़ोर पड़ सकते हैं।उस लम्हे के बाद बाद वो कमज़ोर पड़ते ही गए।बीमारी से उनका संघर्ष जारी रहा।कभी घर कभी अस्पताल के साथ 13 जून को ये संघर्ष लखनऊ के मेडिकल कॉलेज ट्रॉमा सेंटर में समाप्त हुआ।वह विराट साहित्य पुरुष अनंत की ओर कूच कर गया।हम सब सिर्फ उनकी कलम के सहारे बेसहारा हो गए।बचपन से कबीर के अंतिम संस्कार में फूल बनने,दो समुदायो में अपना अपना कहते सुना था,मुद्रा जी ने वह अंत में दिखा दिया।जब उनके जिस्म पर हर कोई अपने हक़ से हाथ बढ़ा रहा था।ताउम्र कहीं किसी मज़हबी खाँचे में न बैठने वाली कलम आज सबका हो जाना चाहती थी।
हमें मुद्राराक्षस जी के अंतिम संस्कार में बैकुंठ धाम जाना था।आखिर उनसे इतना सीखा था तो जाना ही था और गए भी।पूरे शहर के लेखक,रंगकर्मी,समाज सेवक सब मौजूद थे।इतनी ढेर सारी कलमो के बीच वह कलम ख़ामोशी से लेटी थी।बारी बारी फूल मालाएँ चढ़ाई जा रहीं थी।न कोई धर्म दिख रहा था न कोई वर्ग।फिर एकदम से बौद्ध धर्म का ज़िक्र हुआ।कामरेड ने नारा दिया मुद्रा जी के नास्तिक होने का।फिर दोनों लाल और नीले झंडे एक हो गए।बारी बारी से अपने विचारो को रखा।कभी तेज़ तो कभी धीरे लाल सलाम के नारे लगते तो बीच में बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मन्त्र घुल जाता।अजब नज़ारा था।कबीर को लेटा हुआ देख रहा था मगर मगहर से विपरीत लखनऊ में बिना झगड़े गोमती किनारे विद्युत् शवदाह गृह में बीच का रास्ता निकला।दोनों झंडो ने मिलकर मुद्रा जी का एक एक कन्धा थाम लिया ।हम सब धीरे धीरे आगे बढ़े साथ में सरकारी राज्य सम्मान की सलामी ने मुद्रा जी के लिए शोक धुन बजाई।सब कुछ कितना गुँथा गुँथा था।एक तरफ मुद्रा जी का लड़का दूसरी ओर हफ़ीज़ क़िदवई,तीसरी ओर कामरेड दीपक कबीर और चौथी ओर बौद्ध धर्म गुरु।सबने मिलकर उस मिली जुली रूह को अनंत की ओर भेजा।हर तरह के हाथ अंत तक मुद्रा जी के साथ रहे।विद्युत् शवदग्रह के आखरी गेट तक यह चारो अलग अलग ध्रुव मुद्रा जी के एक सूत्र से मिले रहे।कहते हैं की जब कोई दिलों पर राज करने वाला जाता है तो अपने पीछे अपने जैसे ही लाखो दिल छोड़ जाता है।हम तो उस परम्परा के थे जिसने मुद्रा जी को पढ़ कर पढ़ना सीखा।कितना अलग है जिस महान लेखक को आप बचपन से पढ़ते रहे हों उसके साथ अंत तक का सफ़र हो जाए तो जीवन धन्य है।यह हाथ जिन्होंने उनकी पकड़ाई कलम थामी उन्ही हाथो ने उनको अनंत तक पहुँचा दिया।एक कलम का कर्तव्य कलम ने पूरा किया।अब मुद्रा जी का बताया ही हमारे लिए या हम जैसों के लिए रौशनी का काम देगा।नमन नही कहेंगे,कोशिश करेंगे अपने आप में आपको ज़िंदा रखने की।कठिन है मगर मुद्रा का साथ हर कठिन को सरल करने की क़ूवत रखता है।दोस्त,गुरु,पथ प्रदर्शक मुद्राराक्षस को बहुरंगी सलाम।
हफ़ीज़ क़िदवई

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