अपनी ज़मीन को छोड़ना हमेशा कलेजा निचोड़ने जैसा होता है।इसकी तक़लीफ़ वही समझ सकते हैं जिन्हें उससे मोहब्बत हो।घाटी जैसी खूबसूरत जगह से जब उसकी खूबसूरती कश्मीरी पण्डित निकल रहे थे तब घाटी को झूम कर उन्हें रोकना चाहिए था।कश्मीरियों को उनके हाथ पकड़ कर अपने दिलों के करीब खीच लेना चाहिए था।सियासत जो भी हो उस वक़्त जो हुआ वह नही होना चाहिए था।मुज़फ्फरनगर दँगे हुए,जब हज़ारों मुसलमानो को अपने गाँव, अपनी माटी से बिछड़ना पड़ा, तब वहाँ के लोगो को उन्हें रोकना चाहिए था।साथ के खेले साथी जब अपनों को छोड़ भाग रहे थे तब बड़े भाइयो को उन्हें रोकना था,नही रोका।जाने दिया,यह गलत था।अब एकबार फिर कैराना से लोग जा रहे हैं।पता नही कितना सच है फिर भी अगर एक शख्स भी घबराकर जा रहा है तो रोका जाए।वजह कोई भी हो,उन्हें रोकना ही होगा।सियासत में अपने घर तबाह करने की परम्परा को बदलना होगा।इतिहास में गलतियां सबसे हुई हैं, इसे आज सुधारना होगा।नफरत की नई फसल बोने से पहले उसे रोकना होगा।आज उठिए,हर जाने वाले को रोकिये,कहिये की ज़मीने कब तक छोड़ी जाएँगी,इंसानियत कब तक भागेगी।जिन्होंने माटी को छोड़ दिया वह आजतक इसकी खुशबू के लिए बेचैन हैं।परेशान हर शख्स है।भागने से पहले उस सियासत को समझिये जो दिल में नफ़रत को पैदा कर रही।हम और आप उन्हें अच्छे से जानते हैं।उनसे बचिए।कुछ न्यूज़ चैनल चटखारे लेकर इसे परोसेंगे,मसाला लगाएँगे ताकि आपको गुस्सा आए।आप सब कुछ भूलकर इनके इशारों पर नफ़रत का परचम बुलन्द करें, तो भाइयो ठहर जाइये।रुक कर खुद महसूस कीजिये।ऐ पश्चिम के लोगों अपने भाइयो को अब थाम लो वरना ईद और होली में गले मिलने वाले कन्धे भी नही मिलेंगे।गुझिया और सिंवई का मिला जुला ज़ायका नही मिलेगा।कुछ लोग हमारे तुम्हारे झगड़ो से सियासत की बुलंदिया पा जाएंगे और हमारे हिस्से में सिर्फ रह जाएगी टीस।माटी की टीस।ठहर जाओ भाई,यूँ मत जाओ।अब कुछ नही दोहरायगा।इस माटी से मोहब्बत हो तो रुक जाओ।अच्छे बुरे हालात मिलकर झेलेंगे भाई।मिलकर।साथ रहकर।©
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