"यार मुझे मत बुलाओ प्रोग्राम में,तुम मेरी तक़लीफ़ तो समझते हो।अगर वाक़ई ज़रूरी हो तो कहो आ जाए।"यह वह लफ्ज़ थे जो आज से हमेशा कानों में गूँजेंगे।अब इन अल्फाज़ो को बोलने वाला कभी नही बोलेगा मगर उनका लिखा हर लफ्ज़ तब तक बोलेगा जब तक यह दुनिया रहेगी।मुझे बचपन से याद है सहारा अख़बार में उनका कॉलम निकलता था।सब कुछ देखे बिना सीधे उनपर नज़र पड़ती और एक साँस में उन्हें पूरा पढ़ जाना।फिर वक़्त गुज़रा उनसे मुलाकात हुई।लगा ही नही की वह इतना बड़ा लेखक हमारे सामने हैं,धीरे धीरे रिश्ते बढ़ते चले गए।जिस कैफ़ी अकेडमी में मैं हूँ उसी के बड़े कद में वह थे।कभी पाठक रहा तो यहाँ वह अभिभावक हो गए।इतना सादा मिजाज़ इंसान पहले कभी नही देखा था इसलिए एक अजब छाप सी दिल पर पड़ गई।अब जब वह शख्स चला गया है तो इतना लिखने का दिल है की यह अवध की ज़मीन भर जाए।इसके ज़र्रे ज़र्रे से मुद्राराक्षस मुद्राराक्षस आवाज़ आए।मुझे हमेशा फ़ख्र रहेगा की हमने मुद्राराक्षस को देखा है।उनसे सीखा है।उनके सामने लिखा है।यह फ़ख्र उन सबको होगा जिन्होंने इस महान कलम को देखा है।आज मैं बिलकुल नही रोऊंगा,बिलकुल नही मायूस होऊँगा, बिलकुल नही घबराऊँगा क्योकि आज मुद्राराक्षस अपने जिस्म से आज़ाद होकर हम सबमे घुल गए हैं।उनके साथ बीता हर पल रौशनी है हम सबके लिए।आइये आज अपने आप से वादा करें की हालात चाहे जितने विपरीत क्यों न हों, हम अपनी कलम न रोकेंगे,न तोड़ेंगे,न झुकने देंगे,क्योकि हम मुद्राराक्षस को देख कर लिखने वाले लोग हैं।उनकी शान और इज़्ज़त के लिए इस कलम को हमेशा आज़ाद रखेंगे।हमेशा आज़ाद रखेंगे।हमेशा आज़ाद रखेंगे।©
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