Tuesday, June 14, 2016

इक टक कबीरा

मुद्राराक्षस जी के अंतिम संस्कार में बैकुंठ धाम जाना था।आखिर उनसे इतना सीखा था तो जाना ही था और गए भी।पूरे शहर के लेखक,रंगकर्मी,समाज सेवक सब मौजूद थे।इतनी ढेर सारी कलमो के बीच वह कलम ख़ामोशी से लेटी थी।बारी बारी फूल मालाएँ चढ़ाई जा रहीं थी।न कोई धर्म दिख रहा था न कोई वर्ग।फिर एकदम से बौद्ध धर्म का ज़िक्र हुआ।कामरेड ने नारा दिया मुद्रा जी के नास्तिक होने का।फिर दोनों लाल और नीले झंडे एक हो गए।बारी बारी से अपने विचारो को रखा।कभी तेज़ तो कभी धीरे लाल सलाम के नारे लगते तो बीच में बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मन्त्र घुल जाता।अजब नज़ारा था।कबीर को लेटा हुआ देख रहा था मगर मगहर से विपरीत लखनऊ में बिना झगड़े गोमती किनारे विद्युत् शवदाह गृह में बीच का रास्ता निकला।दोनों झंडो ने मिलकर मुद्रा जी का एक एक कन्धा थाम लिया ।हम सब धीरे धीरे आगे बढ़े साथ में सरकारी राज्य सम्मान की सलामी ने मुद्रा जी के लिए शोक धुन बजाई।सब कुछ कितना गुँथा गुँथा था।एक तरफ मुद्रा जी का लड़का दूसरी ओर हफ़ीज़ क़िदवई,तीसरी ओर कामरेड दीपक कबीर और चौथी ओर बौद्ध धर्म गुरु।सबने मिलकर उस मिली जुली रूह को अनंत की ओर भेजा।हर तरह के हाथ अंत तक मुद्रा जी के साथ रहे।विद्युत् शवदग्रह के आखरी गेट तक यह चारो अलग अलग ध्रुव मुद्रा जी के एक सूत्र से मिले रहे।कहते हैं की जब कोई दिलों पर राज करने वाला जाता है तो अपने पीछे अपने जैसे ही लाखो दिल छोड़ जाता है।हम तो उस परम्परा के थे जिसने मुद्रा जी को पढ़ कर पढ़ना सीखा।कितना अलग है जिस महान लेखक को आप बचपन से पढ़ते रहे हों उसके साथ अंत तक का सफ़र हो जाए तो जीवन धन्य है।यह हाथ जिन्होंने उनकी पकड़ाई कलम थामी उन्ही हाथो ने उनको अनंत तक पहुँचा दिया।एक कलम का कर्तव्य कलम ने पूरा किया।अब मुद्रा जी का बताया ही हमारे लिए या हम जैसों के लिए रौशनी का काम देगा।नमन नही कहेंगे,कोशिश करेंगे अपने आप में आपको ज़िंदा रखने की।कठिन है मगर मुद्रा का साथ हर कठिन को सरल करने की क़ूवत रखता है।दोस्त,गुरु,पथ प्रदर्शक मुद्राराक्षस को बहुरंगी सलाम।

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