उछलते कूदते डाइनिंग टेबल पर रखे सेबो पर एक हाथ मारा।झट से एक सेब उठा उसकी सेहत का मुआयना करने लगे।सेब में एक दाग था।मैं उसे डस्टबिन में फेकनें ही जा रहा था की माँ ने रोका और कहा फेको मत। मेरे हाथ से सेब लेकर चाकू से काटकर दाग हटा दिया और कहा बेफिक्र होकर खाओ।उसके बाद कहा यूँ मामूली सी कमियों से पूरी बेहतरीन चीज़ फेका नही करते।कमियो को हटा दो तो वह वैसे ही उम्दा लगेगा जैसा तुम चाहते हो।थोड़ी बहुत कमियों से बहुत सी अच्छाइयों को नही फेका जाता है।हमने भी सीखा यूँ मामूली नाइत्तेफाकी से या कमियों से किसी को पूरा मत खारिज किया जाए।आजकल तो पूरा सेब फेक देने का फैशन है और डाक्टर भी कहते है दाग लगे फल मत खाओ।तो ऐसी पीढ़ी तो हरचीज़ को एकदम से खारिज करना ही सीखेंगी।तभी तो बड़े बड़े लेखक,नेता,विचार सब दो कौड़ी के कहे जाने लगे।पढ़ाई के दौरान जिन लोगो के लिखे इतिहास को रट रट के भी मामूली से नम्बर मुश्किल मिले हों,वह लड़के उन इतिहासकारो को आइना दिखा रहे है।हम ज़रा सी कमियां देखते हैं और जीतोड़ मेहनत करते हैं उसे ख़ारिज कर देने की।हैरत है हम सीखना नही चाहते और न ही बर्दाश्त करना।हम सब अब इतने सियासी होने लगे हैं की हमारे अंदर की कलाएँ दम तोड़ने लगी हैं।आँखे सिर्फ सियासी रँग से ही काम करने लगी हैं।दिमाग ज़रा भी सियासत से नही हटना चाहता।हमारी सियासत ने हमे दूसरे को पूरी तरह ख़ारिज कर देने की बीमारी दे दी है।मुझे खुशी है की मेरी माँ ने सेब के सहारे ही सही ज़िन्दगी का वह फ़लसफ़ा समझा दिया जो किताबो में भी ना मिलता।लोगों की कमियों को एक किनारे रख उसकी अच्छाईयो को देखो।हम मक्खी नही हैं जो उड़ कर सिर्फ गन्दगी पर बैठे,मधु मक्खी बनिए और रस पर बैठिये ताकि शहद का निर्माण हो नाकि हैज़ा का।अब पूरा सब मत फेकिए उसकी कमी को हटाइये और मज़े लीजिये।©
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