एक तरफ नवाबी दरबार चढ़ रहा था वही दूसरी तरफ साज बढ़ रहे थे।यह जो लखनऊ है न ,यह एक ही दौर में टूट रहा था और उसी दौर में बन भी रहा था।नवाब शुजाउद्दौला और आसफ़ुद्दौला के ज़माने में ख़ुशी महाराज कथक को सींच रहे थे।अवध और कथक एक साथ तान में था। आसफ़ुद्दौला के बाद एक तरफ अवध नवाब सआदत अली ख़ाँ, गाज़ीउद्दीन हैदर,नसीरुद्दीन हैदर के साथ ऊपर नीचे हो रहा था।उसी दौर में हिलालजी,दयाल जी,प्रकाशजी का कथक ऊंचाई के रुख पर था।महलों कोठियों में साजिशे चल रही थीं वहीं ड्योढ़ी में घुँघरू बज रहे थे।मोहम्मद अली शाह,अमजद अली शाह,वाजिद अली शाह जहाँ एक और अवध को कायम रखने के लिए जी जान बटोरे थे।अवध के रुपहले आँचल को बचाए रखने के लिए फिक्रमन्द थे।उसी वक़्त प्रकाश जी के बेटों दुर्गा प्रसाद और ठाकुर प्रसाद ने इनसे कन्धे से कन्धा मिलाकर इस आँचल की चमक यानि कथक को बचाए रखा।यहाँ तक बिखरते मायूस अवध को घुंघरुओं की आवाज़ से ज़िंदा रखा।दुर्गा प्रसाद की कथक कलाओं ने फिरंगियों के दिए दर्द पर मरहम का काम किया।वहीं वह दौर भी आया जब अवध टूटकर बिखर गया मगर दुर्गा प्रसाद के बेटों कालका जी और बिन्दादीन ने अपनी कथक की ड्योढ़ी को तब भी बचाए रखा।कालका जी ने कोठियों,बगीचो के साय में कथक को बचाए रखा।जब अवध का बच्चा तड़प कर टूट रहा था तब बिन्दादीन के सिखाए लड़के उनकी तड़पन पर मुस्कान के फाहे बिखेर रहे थे।यहाँ तक इनकी अथक मेहनत और नए तजुर्बो ने हिंदुस्तान के कथक को लखनऊ घराने की मुठ्ठी में कर दिया।एक ही वक़्त में एक शाही खानदान अवध के दर ओ दीवार से रुखसत हो गया वहीं एक परिवार जो कला के एक सिरे को थामे रहा उसने हिंदुस्तान के कथक को जीत लिया।नवाब और इन नर्तक में एक अलग ही रिश्ता था।कभी नवाबो में नर्तक गूँथ गए तो कभी नर्तक में नवाब।लखनऊ घराना इसी लिए गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल था।कथक सम्राट बिन्दादीन जब अपनी छांप छोड़ रहे थे तब उन्हें नवाब वाजिद अलीशाह जैसा कला को सींचने वाले साए की बेहद कमी खली।फिर भी नवाबो को उन्होंने लखनऊ घराने में ज़िंदा कर दिया।ज़रा सा सर उठा कर देखिये तब आपको बिन्दादीन,दुर्गाप्रसाद वाजिद अलीशाह से बाते करते दिखेंगे।उनकी मुस्कुराहटों में तुम मज़हब ढूंढना।अगर दिख जाए तो बताना।घुँघरू से उसका मज़हब पूछना,खनक से उसका मज़हब पूछना शायद तुम्हारे दिलो के फ़र्क को यह समझ पाए।मैं तो बस इतना जानता हूँ की मेरे लखनऊ को कितना समझोगे।इसकी हर अँगड़ाई में मोहब्बत है।समर्पण हैं।तरक्की है।लखौरी की ईंटो को उखाड़ो तब देखो कितनी दास्ताने दफ़न हैं इसमें।महसूस कर सको तो यही लखनऊ पूरे मुल्क़ की रूह है।हम सबमे लखनऊ है।लखनऊ में हम सब हैं।©
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