हाँ तो तुमने चन्द गोलियों से उसे मार दिया।बेवक़ूफ़।तुमसे बड़ा बेवक़ूफ़ नही देखा।तुम्हे क्या लगता है वह मर गए हैं।रूह कहीं मरा करती हैं।तुम्हारी गोलियों की आवाज़ उनके मुँह से निकली आह की आवाज़ के आगे बौनी है।वह जो उनके मुँह से आखरी आवाज़ निकली होगी,तुम्हे पता है वह क्या है।वह ख़ुदा ने भी सुनी होगी।तुम्हारी गन्दी ज़हेनियत ख़ुदा के दिए फ़न को मिटा देना चाहती थी।सुनों, ध्यान से आसमान और ज़मीन की धड़कन को सुनों, वह रो रहीं हैं।उनके रोने से मौसिकी पैदा हो रही है।वह मौसिकी जो मेरे ख़ुदा से तुम्हारी शिकायत कर रही है।उठाओ बारूद और पीतल की गोलिया और इस ज़मीन और आसमान को छलनी कर दो।तुम आज मुझे और छोटे और बेचारे दिख रहे हो।तुम्हे लगा मेरे दोस्त अमजद साबरी को खत्म कर दोगे, बेवक़ूफ़।वह जिस्म से आज़ाद होकर दुनिया के ज़र्रे ज़र्रे में मिल गए हैं।जब तुम अकेले में परेशान होना।चीख कर अपने बाल नोचने का दिल करे तो साबरी की कव्वाली सुनना, तुमहे सुकून मिलेगा।तुम्हे पता है जब से तुमने उन्हें गोली मारी है तबसे मैं उनको सुन रहा हूँ,लोग उन्हें सुन रहे हैं।लग रहा है वह मेरे सामने बैठे हैं।मैं उन्हें देख पा रहा हूँ और सुनो अपनी सारी नस्ल लगा देना और अपने जैसों से कहना की वह भी पूरी ताक़त झोक दे,तब भी एक सिंगल साबरी नही पैदा कर पाओगे।मुझे रत्ती भर हैरत नही है तुमपर,तुम्हारा ख़मीर ही खट्टा है।तुम उस आवाज़ के जादूगर को अब क्या खामोश कर पाओगे।तुम्हारी नस्ले उन्हें सुन कर बड़ी होंगी।जब तुम्हारे बेटे इश्क़ में होंगे तब साबरी उनकी रूह में होंगे।जब तुम्हारी बेटियां अपनी आवाज़ खुद बुलन्द करने लगेंगी तो उसकी रिदम होंगे साबरी।तुम्हारे दिमाग का ख़ालिस पागलपन कभी भी रूहों को छू भी नही पाएगा।कुछ पागलों को लगता था की गाँधी,बेनज़ीर,पनसरे,दाभोलकर,स्कूली बच्चों,मासूमो को वह मार कर जीत जाएंगे,वह सब हार गए।यह सब आजभी हमारे ज़हनों,दिलों, रूहों में ज़िंदा हैं।तुम्हारी कुछ पागलपन से भरी गोलियों ने हमे यहाँ हज़ारों किलोमीटर दूर मेरे दोस्त अमजद साबरी से मिलवा दिया।आओ हमे मारो क्योकि अब हम में हैं साबरी,उनको मारो जिनमे हैं साबरी।देखें तुम साबरी को मार पाते हो या अपनी रूह को।खैर अपनी रूह को क्या मारोगे।तुम तो मरी हुई रूह के सड़े हुए जिस्म हो।हट जाओ बदबू आ रही है।©
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