Thursday, June 23, 2016

धर्म एक कला है

तुम्हारा अदृश्य,निराकार के सामने पाँच वक़्त झुकना क्या है।एक कला है।कितनी खूबसूरती से तुम सब मिलकर ,एक वक़्त में,एक जगह,एक साथ,एक जैसी प्रार्थना करते हो।वह प्रार्थना में तुम्हारे सर से पैर के अंगूठे तक पूरे जिस्म को तरह तरह की कला से मुड़ते हुए देखता हूँ।तुम्हारे मुँह से एक धुन में कलमा का निकलना और कुरान की तिलावत एक नायाब कला है।यह आवाज़,याददाश्त और खूबसूरत एहसास की मिलीजुली कला है।सोचता हूँ इतनी अरब की रेत में कला की समझ कैसे आई।नमाज़ के हर अरकान में कला की सारी खूबियों को बारीक़ी से कैसे पिरो दिया गया।मुँह धोने से नहाने तक,कपड़ो से खाने तक,कला को कितना सींच दिया अरब के इस धर्म ने।यह अद्भुत है, मैं सोचता हूँ वह कौन कला का ख़ुदा होगा जिसने इतनी खूबसूरती से कला को प्रार्थना में पिरो दिया।तुम ही नही मैं तो गंगा के किनारे एक साथ हज़ारों हाथों को आग को ऊपर नीचे करता हूँ तो सोचता हूँ यह अद्भुत कला किसने पिरोई है इनमें।जब शँख की आवाज़ दिमाग की अंतिम सतह को हिला रही होती है, तो सोचता हूँ यह किसने खोजा होगा।जब मैं मन्दिरो में सिंदूर और चुनरी ओढ़े मूर्ति देखता हूँ,तब कलाकार के हाथ चूमने का दिल करता है।एक धार से दूध को गिरते देखने की कल्पना से भर जाता हूँ।यही नही धीरे धीरे चलते ज़ाफ़रानी इंसानो के मुँह से एक जैसी आवाज़"बुद्धम् शरणम् गच्छामी" सुनना दिल को छंछना देता है।मेरे लिए यह सारी क्रियाएँ एक कला हैं।मैं नँगी तस्वीरों में कला को कम देख पाता हूँ,नंगेपन से उचकते छिछोरे टाइप के लड़को में कला को धुन्धलाता देखता हूँ।मेरे लिए धर्म में कला है या कला में धर्म है।मैं सारे साज को धर्म में देखता हूँ।मेरा संगीत जायसी,खुसरु तो नृत्य मीरा से होते हुए कृष्ण और शिव से मिल जाता है।मैं सधी हुई कला को पैगम्बर मोहम्मद की बताई प्रार्थना की क्रिया में देखता हूँ।बिना बैर भाव के कला की दृष्टि से इन्हें देखो तो तुम्हे नमाज़ पढ़ते हुए लोगों में तरंगे तो आरती उतारते लोगों में लहरे दिखेंगी।इनकी एक एक हरकत को दिल लगाकर देखो तो देख पाओगे की यह धर्म कला से भरपूर हैं।इनकी ऊँगली से लेकर सर तक कला में डूबे हैं।इनकी आँखों की पुतलियो से ज़बान तक की हरकतें कला से भरी पड़ी हैं।इन्हें उस नज़र से मत देखो जिस नज़र से यह खुद देखते हैं।इन्हें कला की नज़र से देखो तब सोचो वह जो ऊपर है, या नही भी है, कोई भी है, वह कितना बड़ा कलाकार है।उसकी प्रार्थना में कला की बेजोड़ झलक देखो और मुस्कुराओ की कितनी समझदारी से हमारे धार्मिक विद्वानों ने कला को घर घर में ज़िंदा रखा।बच्चे बच्चे में पैबस्त कर दिया।इस कला को भी दूसरी कलाओं की तरह इज़्ज़त दो।यह नायाब है।©

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