यह मुसलमानो वाला कपड़ा नही पहनना है.... यह हिन्दुओ वाला खाना नही खाना है.... यह लफ्ज़ जब किसी सात आठ साल के बच्चे के मुँह से सुनता हूँ तो दिल बैठ जाता है।जाने अनजाने माँ बाप के दिलों का ज़हर मासूमो में उतरते देख रूह टूट जाती है।आईना देखता हूँ,चेहरा धुन्धला नज़र आता है।आँसू,जो बहते भी नही,सूखते भी नही,दिमाग को भारी कर देते हैं।कितना धोखा दे रहा हूँ अपने आप को।लगता है की यह जो अमन और मोहब्बत का एहसास रोज़ जीता हूँ,वह कितना फ़र्ज़ी है।जिस ज़हर से आने वाली नस्लो को बचाने के लिए मेहनत करता हूँ,वह बच्चों में कुदरती आ गया है या माँ के दूध के साथ आया है।उन माँ बाप पर तरस आता है जो बच्चे को खूबसूरत ज़िन्दगी तो नही दे सके मगर नफ़रत दे गए।जिन्होंने अपने बच्चे को पुचकारते हुए दूसरे बच्चों के लिए डायनामाइट को पैदा कर दिया।यह कोई मज़ाक नही है की चन्द सालों के बच्चे हिन्दू मुसलमान करने लगें।यह तफ़रीह नही है, यह एक सवाल है।हमारी परवरिश का सवाल।सोचता हूँ अब अपना सारा वक़्त टीके को खोजने में लगा दूँ।यह टीका जो बचपन में ही एंटी हेट वैक्सीन की तरह काम करे।
अब बड़ो को समझाना तो इसलिए नामुमकिन है क्योकि उन्होंने न्यूटन के सारे सिद्धान्त को छोड़कर सिर्फ क्रिया प्रतिक्रिया का सिद्धान्त रटा है और उसमे पीएचडी की है।उन्हें अच्छे से पता है की तलवार की प्रतिक्रिया त्रिशूल से कैसे देनी है।इनकी आँखों की रेटिना इंसान नही देख पाती, यह सिर्फ हिन्दू मुसलमान देख पाते हैं।यह अभी यहाँ भी डंक मारने आएँगे।मैं इन भस्मासुरों से ज़रा भी उम्मीद नही करता।यह वह लोग हैं जो एक व्यक्ति को पूजने में या उसका विरोध करने में इतना ज़हरीले हो चुके हैं की इनके स्पर्श मात्र से लकवा मार जाए।यक़ीन न हो तो इनके घरों के बच्चों और आश्रितों को देखिये।उनकी ज़बानें भी काली पड़ने लगी हैं।मेरे लिए अब सिर्फ बच्चे ज़रूरी हैं, जो इनके ज़हर से भर रहे हैं।जब शिव जी ने दुनिया का सारा ज़हर पी लिया था तब हैरत होती है की यह इंसान कहाँ से इतना ज़हर ले आया।यह झूठे,फ़र्ज़ी मज़हब के नाम पर पूरी इंसानियत को घुन की तरह खाने लगे हैं।हो सकता है मैं पागल हूँ, बहरा हूँ, नही सुनूंगा,आप कुछ भी बक्के।मैं अपने बच्चों का जिस्म इस ज़हर से नीला होते नही देखना चाहता।मुझे मेरे बच्चे में बच्चा देखना है, साँप नही।मैं यह ज़हर मिटाकर ही रहूँगा।भले हज़ार साल जीना पड़े।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, June 28, 2016
बख्श दो
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