सच बताएं हमें लगता है साल में दो बार रमज़ान आते हैं।अभी पिछले रोज़ों की कमज़ोरी गई नही की यह फिर आ गए।आ गए तो आ गए,अब इनका इस्तेकबाल तो बनता है।हम कोई फ़िल्मी संजय दत्त तो हैं नही की कह दे की रमज़ान के पूरे महीने हथियार नही उठाएँगे, ईद के चाँद के बाद ही सारा कारोबार चलेगा।न ही जैश वैश के संगठन से हैं की कह दे, संघर्ष विराम।रमज़ान हैं तो हैं इसमें नया क्या करें।जो आदते पहले थी वह अब भी रहेंगी।
बुराई,झूठ,मक्कारी,खून खराबा, धोखा,ज़लालत तो हमेशा मना है तो अब भी नही।सब्र तो बचपन से करते आ रहें, टीवी और यूट्यूब पर क्या क्या देख कर सब्र किया है मेरा ख़ुदा ही जानता है।वैसे लखनऊ में आजका रोज़ा वाक़ई रोज़ा लगेगा।बड़े मंगल की पूरी,शरबत,बताशे ,बुंदियाँ, कढ़ी चावल से सजी सड़के और हमारा रोज़ा।कितना ज़ुल्म है न ।जहाँ एक तरफ बड़ा मंगल खिलाने पर तुला है तो वहीं रमज़ान भूख रोकने पर,यही तो रोज़े का मज़ा है।हाँ अगर कोई गंगा जमुनी स्टाल हुआ तो शायद वह शाम को प्रसाद खिलाए,मग़रिब की अज़ान के साथ प्रसाद बाँटना शुरू करे मगर यह नज़ारे की कल्पना बेईमानी है।
वह दौर अलग था जब मोहर्रम का शरबत जेठ के बड़े मंगल में बराबर से घुल गया,यह दौर अलग है।आज कोई शाम तक नही रुकेगा की उसका दिन भर का कोई भूखा भाई कुछ खा ले।खैर हमें क्या मदमस्त से जिधर चाहा अफ्तार किया जिधर चाहा प्रसाद चखा।तुम अपनी देखो और अपने वालों में देखो।मेरे लिए तो सब मुबारकां।दिन में रोज़ा रात में मंगल ही मंगल।चलो तमाम हँसी मज़ाक के साथ दिल पर भारी पत्थर रख कर इस खूबसूरत महीने का इस्तेक़बल करते हैं।बिना कोई काम रोके,बिना तक़लीफ़ पहुँचाएे,बिना दिल जोई किये अगर ज़िन्दगी में रोज़ा दाखिल हो रहा है तो यही तो रमज़ान है।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, June 6, 2016
रोज़ा ही रोज़ा
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