अच्छा तो रोज़ा हो।सुबह जब सोकर उठते होंगे,सुबह कितनी फीकी फीकी लगती होगी।दस बजने पर चेहरे पर बारह बज रहे होंगे।फिर ग्यारह बजे तक हल्की हल्की प्यास से गला सूख रहा होगा।बारह बजते ही हल्की हल्की भूख भी लगेगी।एक बजे से तीन बजे के बीज चिड़चिड़ाहट भी हो सकती है।तीन से चार,पाँच बजे तक भूख और प्यास दोनों जवाब दे देते होंगे।दिमाग ख़ुश्क हो जाता होगा।बदन निढाल हो जाता होगा।छः बजे तक सब कुछ बोझिल सा हो जाता होगा।अब तो दिल दिमाग भी भूख प्यास जैसी मामूली सी ख़ुशी की तरफ दिमाग लगाने को न तैयार होते होंगे।साढ़े छः बजे तक सारी ख्वाहिशों से जी हट जाता होगा,कुछ भी याद नही रहता होगा।दिमाग शून्य की तरफ जाता होगा।यह परेशानी की चरम सीमा है।
अब बजते हैं सात और एक दम से खुशियो का दरवाज़ा खुलता है।दिन भर थका, प्यासा,भूखा जिस्म ढेर सारी खुशियो पर टूट पड़ता है।गीला, सुखा, तला, भुना सब दस मिनट में ख़ाली पेट के अंदर और सुकून की साँस की चलो एक रोज़ा कटा।उन घन्टो में सब कुछ खा लेने की चाह, पा लेने की चाह।फिर बजते हैं आठ,पेट थोड़ा थोड़ा फूलता है।बैठना और लेटना मुश्किल होता है।थोड़ा टहलना चाहता है जिस्म।किसी तरह अल्लम् गल्लम् पेट में अपनी जगह अख्तियार करता है तब बजते हैं दस।कुछ खास खाना खाया नही जाता और हल्का फुल्का खाकर सो जाना बेहतर लगता है।फिर अगली सुबह।रात भर का इकट्ठा एक दम से बाहर।
जिस्म फिर आज़माइश के किनारे पर।आपकी खाने की तमाम तहे और लीटरो पानी ने सुबह ही साथ छोड़ दिया ताकि आपकी आज़माइश ईमानदारी से हो।इसलिए खुशियो में इकठ्ठा हर चीज़ परेशानी के दौर में पहले खत्म होगी।यह जो रोज़े का चक्र है यह मुझे बड़ा अजीब मगर बड़ा वास्तविक लगता है।यह बताता है परेशानी लम्बे वक़्त रहती है और धीरे धीरे बढ़ती जाती है।खुशहाली कम वक़्त रहती है,एक दम से आती है और ज़रा सी लापरवाही में कम वक़्त ठहर के निकल जाती है।इसीलिए अगर हम ख़ुशी को धीरे धीरे इंजॉय करें तो ज़्यादा मज़े ले पाए।एक दम से ढेर भर इफ्तार हमारे पूरे खाने के सिस्टम को बैठा देता है।इसीलिए परेशानी के बाद आने वाली खुशियो में बौखलाना नही चाहिए।वैसे भी कुदरती तरीके से परेशानी का वक़्त लम्बा ही होता है।दिनभर के सोलह घण्टे के रोज़े के बाद इफ्तार आता है।महीने भर के रमज़ान के बाद ईद आती है।तो घबराइये नही।मुश्किल वक़्त को सब्र और मेहनत से काटिये।खुशियाँ आने पर परेशानी का वक़्त मत भूल जाइये,क्योकि वह कल फिर आएगा।तब तक इतना जिस्म खराब मत कर लीजिये की कल का वक़्त काटे न कटे।जब परेशानी में दिल ओ दिमाग काम करना बन्द कर दे तो यक़ीनन सामने वह इफ्तार का चाँद मुस्कुराने ही वाला होगा मेरे दोस्त।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, June 27, 2016
धूप छाँव
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ramzan
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