बारिश की फुहार,क्या बात है।झूम कर बारिश में भीगना बेहद पसन्द है।जी चाहता है सारे आसमान को बादल बनाकर अपने ऊपर निचोड़ लू।दिल कहता है यह बादल जी भर बरसे मगर उसी पल दिमाग टपकती हुई झुग्गी झोपडी पर अटक जाता है।एक झटके में बारिश वाले बादल दुश्मन लगने लगते हैं।कपड़े और अनाज समेटती उस औरत को देखकर बारिश का लुत्फ़ ख़ाक हो जाता है।क्या बात है बारिश हो और चाय, पकौड़ी न हो।यह तो बारिश के साथ ज़ुल्म है।जी चाहता है बालकनी में बेंत की कुर्सियो पर बैठ कर सामने गिरती बूंदों और बेसन प्याज़ की पकौड़ियों संग इसमें घुल जाऊ।हल्की सी ठण्डी फुहार और चाय का ज़ायका कौन नही लेना चाहेगा की तभी भूख से मरने वालों के पिचके हुए पेट आँखों में तैर जाते हैं।एक झटके में सारा ज़ायका बारिश के कीचड़ में बदल जाता है।अजब हाल है,खुश होना चाहता हूँ,मगर दिमाग में लगी फ़िल्म हटती ही नही।मैं चाहता हूँ बारिश में बिरहीं और पकौड़ियों के मज़े लू मगर कमबख्त दिमाग वहीं कीचड़ में धसा हुआ रहता है।निगेटिव नही हो रहा बस यह सोच रहा हूँ की वह दिन कब आएगा जब सब बारिश में भीगकर बराबर के मज़े लेंगे,उन्हें छत टपकने की फ़िक्रे नही होगी।वह दिन कब आएगा जब सब बेसन की पकौड़िया बिला फ़िक्र खाएँगे।मैं सोचता हूँ की कुदरत के सबसे खूबसूरत मौसम भी क्या किसी को चुभ सकता है।जिस मौसम का मज़ा हम और आप मिलकर,जीन्स की मोहरिया चढ़ाकर,सड़क पर छपक छईं करते हैं, उसी वक़्त कोई क्यों अपने कील काटे दुरुस्त कर रहा होता है।मालूम है की सब कुछ एक जैसा नही हो सकता,फिर भी इतना बड़ा फ़र्क भी नही होना चाहिए।मेरी प्लेट में पकौड़िया हो तो उनके पास कमसेकम चाय से भरी प्याली हो।मगर मुस्कान तो एक जैसी हो न इस मौसम के इस्तेक़बल के लिए।मेरी ख़ुशी या शिकवा किसी से नही है, बस उस से है जो हम सब पर बराबर की बारिश करता है, मगर एक जगह ख़ुशी तो एक जगह गम को बढ़ा देता है।©
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