देश का सबसे बड़ा राजनैतिक कुनबा बिखर रहा है।वोह परिवार जिसके एक बड़े ने आगे बढ़कर अपने छोटो के हाथ से भैंस के थन हटाकर लालबत्ती थमाई थी।गाँव में अल्हड़ भागते नौजवान भाइयों भतीजो को रेड कार्पेट पर चलवाया था।मैं हैरत में ज़रा भी नही,यह प्रकृति का नियम है, बिखरन।परिवार ज़र्रे ज़र्रे से मिलकर पहाड़ बनता है मगर बड़े बड़े टुकड़ों में टूटकर वोह छोटी छोटी पहाड़ियों में तब्दील भी होता है।
मैं सोचता था की क्या यह विशालकाय परिवार भी टूटेगा,तो मन कहता था ज़रूर।प्रकृति कभी अन्याय नही करती।जो गरीब के लिए नियम वही अमीर के लिए।किसी का परिवार पहले टुटा तो किसी का बाद में,मगर टूटा।यहाँ मैं सियासत को रत्ती भर नही छूना चाहता।मैं यहाँ उस बूढ़े को देखना चाह रहा हूँ,जिसके सामने घर की दहलिज़े बँट रहीं हैं।जिसके सामने दिलों में वोह लकीरे खींची जा रही हैं, जो किसी पर्दे से नही छुपेंगी।सियासत के बड़े माइने हो सकते हैं मगर परिवार में यह कमज़ोरी की निशानी है।
आज वोह जो अपने हर कदम से दूसरो को पछाड़ देता था।जिसका धोबी पछाड़,कोने कोने में मशहूर था।उसके परिवार में उसके सारे दाँव उलटे पड़ रहें हैं।हम बड़े सरल से लोग हैं जो दिख रहा वही देखेंगे।इसके पीछे लिखी स्क्रिप्ट को न पढ़ने की फुर्सत है और न वोह ज़रूरी है।
पहलवान वाक़ई में बूढ़ा हो गया है।अखाड़े की रेत अब उसके जिस्म की चमक नही रही बल्कि आँख में घुसकर उसकी आँखों को भी बन्द कर रही है।देश के सभी बुढ़ों देखो,वोह भी तुममे से ही है।पहलवान की भी वैसे ही नही सुनी जाती जैसे तुम्हारी।पहलवान भी परिवार को पहलवानी सिखाते सिखाते सारे दाँव में फंसकर टेढ़ी सी,ज़बरदस्ती वाली मुस्कान हँस रहा है।आज उन पिताओं को भी जवाब मिल गया होगा जो बेटे को छाता उठाए देख और पिता का हाथ पकड़े जाते देख अपने बेटे को ताना मारते थे।आखिर इतने भीमकाय परिवार में भी रिश्ते वैसे ही चलते हैं जैसे छः सौ स्क्वायर फिट के माकन में चलते हैं।
मैं यहाँ सियासत को नही लाया,न लाऊंगा, मेरे लिए सामाजिक विज्ञानं ज़्यादा अहम् है।मुझे इस पूरे कुनबे के नाम याद हैं, इनमे से बहुत से मेरे साथ के हैं, इनके लम्बे राजनैतिक जीवन को हम आगे भी देखेंगे,या खत्म होते हुए देखेंगे।मगर यह ज़रूर है उस एक बूढ़े के हाथ में फंसी कुरेशिया को देख कर इतने खूबसूरत जाल को देख कर, उस जाल के एक टाँके को टूटता देखकर,बहुत कुछ सामने आ रहा है।देखना यह है की यह टांका पूरे कुरेशिया के काम को खोल देगा या सिर्फ अपना धागा लेकर बिखर जाएगा।
बारीक़ नज़र रखिये,मेरे लफ्ज़ जितनी जल्दी झूठे हो जाएँ उतना अच्छा है इस मज़बूत परिवार के लिए।आज सिर्फ परिवार को छुआ है, सियासत जैसा अहम् सब्जेक्ट नज़रअंदाज़ किया है सिर्फ इसलिए की आप भी देख सकें की यह विरले नही हैं।हम सबकी तरह हर एक का परिवार बिखरेगा ही,तभी तो विनाश और विस्तार का रास्ता बनेगा। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, September 13, 2016
तुम भी चटख गए
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family,
hafeezkidwai
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