जब तुम मार्कशीट की फोटोकॉपी लिए और एक हाथ में सीवी पकड़े टहलते हो तो अफसोस लगता है।अफसोस यह नही की तुम बेरोज़गार हो।अफसोस यह की तुम अपने आप से हार चुके हो।इतना हार चुके हो की तुम्हे दूसरे की चौखट दर चौखट अपनी डिग्रियों की फेहरिस्त घुमाने में भी शर्म नही आ रही है।देखो दो रास्ते हैं या तो महीनो टहलो या तो खुद पर यक़ीन करो।
एक से एक लड़का इस इन इंतज़ार में वक़्त काट रहा है की कब उसके मन की नौकरी आएगी और कब वोह नोट के बिस्तर पर कुलांचे भरेगा।मेरी सुनो,इस वक़्त भारत को इंतज़ार करते युवाओं की नही बल्कि पसीना बहाते नौजवानों की ज़रूरत है।तुम जितना ख़ाली होंगे उतना ही तुम हिन्दू मुस्लिम की भीड़ में तब्दील होते जाओगे।तुम जितना बेकार घूमोगे उतना ही यह ढोंगियों की दुकाने ऊँची होती जाएँगी।
एक बार ठहरो,सबसे पहले शर्म को किसी नदी में विर्सजित कर दो।शर्म और संकोच का श्राद्ध कर दो,खुद की कमज़ोरी और माँगने की आदत को कब्रिस्तान में गहरे गाड़ दो।अब उठो और जो काम मिले उसे करो।उसमे अपनी खूबियों को डालो।ईश्वर ने सबमें कुछ न कुछ दिया है, यही कुछ न कुछ आपको कुछ ज़रूर बना देगा।
आप दालमोठ के पैकेट बेचो,जूस,दाल,टायर,गाड़ी,चिप्स,खाना,सामान कुछ भी बेचो मगर ख़ाली मत टहलो।यह मत सोचना की यह डिग्री क्या दालमोठ बेचने के लिए लिया है, डिग्री दिमाग को बढ़ाने के लिये लिया है, वही दिमाग आज दालमोठ का बड़ा व्यापार करेगा,उसकी पहली सीढ़ी है बेचना।
मैं अगले बीस सालों का भारत सीवी लिए टहलता नही देखना चाहता।सरकारी नौकरी के इंतज़ार में ज़िन्दगी के बेहतरीन 5 साल बर्बाद करते नही देखना चाहता।हो सकता है तुम्हे सब मज़ाक लगे मगर एक बार भारत की तरफ देखो।उसके पास वक़्त और लोग दोनों हैं, मगर दिशाएँ विपरीत हैं।तुम चार घण्टे काम करो,मगर करो।शर्म से श्रम हार जाता है मगर जिसने श्रम को पकड़ लिया उसको कोई भी नही रोक सकता और जिसने श्रम की शर्म को पाल लिया उसे कोई नही बढ़ा पाएगा।
मेरे लफ़्ज़ों को भूल जाओ,उस बात को पकड़ो जिससे तुम्हारे घर में खुशहाली आए।इंतज़ार मत करो,काम करो।खूब सीखो,भाषा,टेक्नोलॉजी सब को सीढ़ियों की तरह बनाओ और आगे बढ़ो।बीमार युवा एक बीमार देश की निशानी है।सब झगड़े,नफ़रत,भिन्नता,दल,धर्म को कोने में रखो और खूब मेहनत करो।मामूली से मामूली काम को अपनी मेहनत और खूबी से चमका दो,तुम कर सकते हो,यक़ीनन यह भारत के ही लोग करेंगे।बस जग जाओ। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, September 17, 2016
जग जाओ
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hafeezkidwai
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