Sunday, September 18, 2016

जंगलियत

घने जंगलों के बाद जब उसने बाहर कदम रखा।दूर तक मैदान,रौशनी तो वोह चहक उठा।लम्बे अँधेरे के बाद रौशनी ने उसे सुरक्षा दी तो वोह उसे पूजने लगा।जँगल में चीज़ें करीब थीं, तो बड़ी दिखती थीं।मैदान में चीज़ें दूर थी तो उसकी आँखों ने मेहनत की और दूर का देखने की ताक़त विकसित की।जँगल में वोह झुक कर चलता था मगर मैदान में उसने आसमान देखा,उसपर चमकता सूरज,तब उसकी गर्दन और जिस्म खड़ा हुआ।मैदान में उसने सुबह को शुभ माना और रात को अशुभ।सूरज को भगवान माना तो अँधेरे को शैतान।फायदा पहुँचाने वाली चीजों को समेटा और नुकसान पहुँचाने वाले से दूरी बनाई।फायदे को भगवान और नुकसान को शैतान की चौखट पर पटखते वोह आगे बढ़ रहे थे।
मैं आपको बहका नही रहा,बस उस ज़िन्दगी को बता रहा हूँ जब हम और तुम बन रहे थे।जँगल से मैदान,मैदान से जँगल,दो तरह की ज़िंदगियाँ बन रही थीं।जिस्म तरह तरह से बढ़ घट रहा था।दिमाग अपने भगवान और शैतान को डर और उल्लास के साथ गढ़ रहा था।जँगल की उभरी आकृतियाँ मैदान में साथ ही थीं।ज़बान लफ्ज़ फोड़ रहे थे।समूह बनना, शिकार,खेती,भगवान,शैतान,पूजा,खाना सब कड़ी कड़ी जुड़ रहा था।इंसान का विकास ऐसे ही तो हुआ है।एक दूसरे के अनजाने बोल को लफ्ज़ में उतारना,समझना और हाथ पकड़ कर निर्माण में लगना।यह बिलकुल वैसे ही हो रहा था जैसे दिल काम करता है।दिल पहले ख़ून खींचता है, फिर बाँटता है,फिर रुकता है।यह तीन क्रियाओं से जिस्म चलता है।वैसे ही इंसान चल रहा था।
अब समझो इस बात को की हम क्यों वापिस लौट रहे हैं।पहले एक होने की जद्दोजहद थी,तो अब बिखरने की क्यों है।अब हमारा रिवर्स गेयर लग चुका है।हम इतना बँट चुके हैं जितनी जिस्म में हड्डी नही।रँग,धर्म,जाति, ज़मीन,धन,कपड़े,बोली,भाषा,खाने सबमें बट चुके हैं।यह बंटना तो शुरू से साथ था बस एक चीज़ जब तक नही बंटी थी तब तक सब सुंदर लगता था।वोह थी दिल।जँगल से मैदान तक दिल नही बँटे थे।कोई किसी की भौतिक चीजों पर अपना निर्माण नही रोकता था।मेरी बात को ध्यान से सुनों,देखो तुम्हारे दिल की सिलाई खुल चुकी है।अब तुम निर्माण के रास्ते पर नही हो बल्कि विनाश के रास्ते पर हो।जिस अँधेरे को तुमने शुरू में बुरा कहा था वोह तुम्हारे दिलों को सियाह कर चुका है।
वैसे मैं निराश नही हूँ,मुझे पता है यह रुकने वाला पल है, यह सियाही कोयले वाली है, जो एक बार फिर जलकर रौशनी पैदा करेगी।यह वही दिलों में पैदा होगी,जिनके दिलों में नफ़रत नही होगी।जिनके दिलों में इतनी जगह होगी की उसमे दूसरा ख़ुशी से रह सके।संकुचित,काली कोठरी से बन्द दिलों का निर्माणकाल खत्म हुआ है।वोह वक़्त काटें बस।कभी कोई हवा उनके सीलन भरे दिल को ज़रूर दहकाएगी और वोह फिर से निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे जैसे हमारे पुरखे बने थे।जिस दिल से मोहब्बत चली गई,उसका निर्माण रुक गया।आप अपना निर्माण मत रोकिये,जीवन,पृथ्वी,सभ्यता को विस्तार दीजिये।मोहब्बत से ही विस्तार होगा बाकि सारे रास्ते झूठे हैं।©

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