Monday, September 26, 2016

ओहो भगत की सालगिरह है

आपकी उम्र वहीं ठहर गई जहाँ आपने आखरी साँस ली।मैं चाहता था की आप बूढ़े होते।जब आप बूढ़े होते तो बहुत सी वोह चीज़ें पैदा होती जो हमे लम्बे रास्ते दिखाते।आपका बुढ़ापा बहुत से सवालों का मुकम्मल जवाब होता।आपकी ज़िन्दगी से ज़बरदस्ती पैदा किये गए सवालों के जवाब आपसे बेहतर कौन दे सकता था।यक़ीन मानिये ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से से आप आजतक निकल ही नही पा रहें या कहें हम निकालना नही चाह रहे।मैं जब जब आपके लिखे शब्दों पर अपनी ऊँगली फेरता हूँ तो मुझे लगता है की आप मेरी ऊँगली पकड़ कर हमे पढ़वा रहे हैं।मैं रोज़ आपके विचारों से टकराता हूँ मगर रोज़ हारता हूँ।हाँ एक बात,मोटी से मोटी किताब मैं आपकी ज़िद में पढ़ जाता,क्योकि मुझे आप किताब लिए दिखते,तो दिल कहता की वोह होते तो तुमसे पहले यह किताब पढ़कर खत्म कर डालते।आपसे लिखने का सबक मिला,की ज़िन्दगी पता नही कितनी दूर जाए,मगर दिमाग से उतरे शब्द हमे मरने नही देंगे।सबसे बड़ी चीज़ गलत के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिये आप ही हमारी रीढ़ हैं।यह सच है की मैं बहुत बार आपकी मुखालफत करता हूँ,क्योंकि यह भी तो आपसे ही सीखा है।मैं आपके बुढ़ापे तक के सफ़र को देख रहा हूँ।मेरी कल्पनाओं में भगत सिंह वोह नही हैं जो एक कच्ची उम्र में शहीद हो गए।मेरी कल्पनाओं में हल्की मूँछो और हैट लगाए चमकता हुआ नौजवान भगत सिंह नही हैं।मेरी कल्पना में सफेद बालों और गहरी आँखों वाला भगत सिंह है।मेरी कल्पनाओं में संविधान पर मज़बूत पकड़ और देश का साँचा ढालता हुआ वोह भगत सिंह है जिसके माथे पर रेखाएँ गहरी हैं।मेरा भगत सिंह बूढ़ा हो रहा है वक़्त के साथ,मगर रोज़ मुल्क़ के लिए नए विचार रख रहा है।मेरा भगत सिंह एक उम्र पर ठहरा हुआ नही है, वोह उम्र का सैकड़ा पार करके आजभी बिना सहारे,हमे सहारा दे रहा है।मैं जब आपसे बात करता हूँ तो अक्सर आप ठहर के बोलते हैं, मेरे दोस्त भगत सिंह,आपका यूँ ठहरना बता रहा की आपके शब्दों की गहराई ने अब जिस्म पर विजय पा ली है।मेरे अनुभवी भगत सिंह देश ही नही दुनियाँ का फ्रेम गढ़ रहे हैं।मैं देखता हूँ की आपकी कमर भले झुक रही है मगर गरीब,कमज़ोर,परेशान के लिए आप कुछ मज़बूत बुन रहे हैं।मैंने देखा है आपने खूबसूरत,मुलायम गद्दों पर बैठने से इनकार कर दिया है।आप बुढ़ापे में भी वही खाट पर बैठे हैं जैसे नौजवान बड़े बालों वाला भगत बैठा हुआ है।मुस्कान और फ़िक्र आज भी एक सी हैं।झुर्रियों ने विचारों की गहराई को और बढ़ा दिया है।मैं आपको लेकर इतनी कल्पनाओं में हूँ की मुझे समझ नही आता की भगत सिंह आज हैं भी की नहीं।हैं तो किस तरह हैं,कैसे दिमागों को रूप दे रहे हैं।मैं आपकी अनंत कल्पनाओं में भी एक चीज़ साफ़ देख पा रहा हूँ मुल्क़ और इंसानियत।भगत सिंह चाहे नौजवान रहें या बूढ़े हो जाए,इन दो चीजों से तो कभी भी मुँह न मोड़ते।मै जिस्म में नही उलझता मगर रूह में न उलझूँ यह हो नही सकता।आपकी रूह,यानि आपके विचार लगातार दिमाग को कुरेदते हैं।उसमे पड़ी गुलथियों को खोलते हैं।तब मुझे लगने लगता है की आप क्या चाहते थे और हम किधर जा रहें हैं।अपने जन्मदिन पर भगत सिंह हाँ आप मेरे दोस्त,एक तो वादा करो की ऐसे ही हमेशा साथ रहोगे।हमारी उम्र के साथ तुम भी बढ़ना।जब उम्र ज़िन्दगी और सोच पर असर करने लगे,तो उस वक़्त का साथ देना,हर उम्र की रौशनी बनकर।©

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