"साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैंद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए"
यह लफ़्ज़ हमारे नही भगत सिंह के हैं।उनकी हर ख्वाहिश पर ठहरिये,सोचिये तब बढ़िए।मुल्क़ को मुल्क़ से मोहब्बत करने वाले नौजवान चाहिए।अपने नागरिकों से मोहब्बत करने वाले नागरिक चाहियें।अगर आपके दिलों में अपने ही लोगो के लिए नफ़रत है तो आप भगत सिंह को मत याद कीजिये।फ़र्ज़ी ज़बान को तक़लीफ़ मत दीजिये।अगर आपके दिल बँटे हुए हैं तो भगत सिंह आपके लिए नही हैं।भगत सिंह का जन्मदिन वोह मनाएँ जो उनके विचारों, कामों, ज़िन्दगी में से कुछ भी अपनी ज़िन्दगी में उतार पाए।भगत सिंह उनके हरगिज़ अपने नही हैं जो नफ़रत में सने हुए हैं।मेरे भगत सिंह का हर लफ़्ज़ सिर्फ मुल्क़ और उसके खूबसूरत दिलों के लोगों के लिए था।आखरी वक़्त भी वोह उन्ही के लिए तड़प रहा था।भगत सिंह अपने जन्मदिन पर हर उस दिल को ताज़गी,मज़बूती और हौसला देना जो आपके देखे ख्वाबो को कहीं न कहीं छू रहे हैं, कर रहे हैं।यह आपकी,हमारी,देश की रूहें हैं। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, September 27, 2016
भगत सिंह
Labels:
bhagat singh,
hafeezkidwai
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment