Saturday, September 10, 2016

शम्मो

झींगुर की आवाज़ सीं सीं आ रहीं थी।रूसे के पत्तों पर हल्की हल्की ओस ठहर रही थी।बाँसवाणी के बाँस आपस में हल्के हल्के मिल रहे थे।दूर से कहीं कुत्तों के भौंकने की भी आवाज़ें आ रहीं थीं।कोहरे की शाम ने गाँव के खड़ंजे पर पर्दा डाल रखा था।दूर एक बल्ब जल रहा था।उसी के सहारे पैर तेज़ी से बढ़ रहे थे की अचानक पतावर की ओट से कोई की सिसकियाँ सुनाई दी।डर और फ़िक्र मिलकर उस तरफ देखने को मजबूर कर रही थीं।बड़ी मुश्किल से लगा की कोई लड़की है।मगर रो क्यों रही है, हिम्मत बटोर कर पास गए तो देखा शलवार पकड़े वोह जम्पर ढूंढ रही है।दर्द से रो भी रही थी।करीब जाकर गौर से देखा तो शम्मो थी।पागल शम्मो।कोई इस ठंडे अँधेरे में इतना ठण्डा हो चुका था की पागल शम्मो में भी अपनी हवस देख चुका था।पता था दूसरी सुबह चाहे शम्मो चीख़ चीख़ के रोए किसी को फ़र्क नही पड़ता।हाँ प्रधानिन को तरस आ गया तो रोटी चाय ज़रूर दे देगी।मैं भी अगली सुबह चीखता रहूँगा तो भी सिवाए हँसी मज़ाक के कुछ नही होगा।उस वक़्त बिना डरे बस उसका जम्पर ढूंढ कर दे दिया और बैग में पड़ा दो रूपये के परलेजी बिस्कुट का पैकेट।शम्मो बिस्कुट देख दर्द में भी मुस्कुरा कर बाँसवाणी में गायब हो गई।एक पागल शम्मो पूरे गाँव में पनपती गन्दगी को समेटे थी।कभी झाड़ियों में,कभी पुराने टूटे मदरसे के गिरे हुए कमरे में,कभी मियांजान की मज़ार से सटी खुदी कब्र में,कभी पयाल के ढेर तो कभी आम की बाग़ की मड़ैया में शम्मो सिर्फ़ गाँव भर के काम आ रही थी।एक पागल शम्मो गाँव की दूसरी लड़कियों के लिए सुरक्षा थी।उस रात जब वोह भागी तो फिर नही दिखी।वोह कब आई थी किसी को नही याद।वोह कहाँ गई किसी को नही फिक्र।हाँ वोह लम्पट ज़रूर ज़िक्र कभी कभी कर देते जो दिन में तो उसे चिढ़ाते मगर रात में उसे अपना लेते।हमारे बीच एक पागल की इससे ज़्यादा क्या अहमियत।तफ़रीह तफ़रीह सिर्फ तफ़रीह और अगर पागल लड़की हुई तो दो कदम आगे।शम्मो का पागलपन बहुतों के लिए फायदेमंद था।उस रात इतनी ठण्ड थी की उसने या तो शम्मो को जमा दिया था या तो हमें।अब तो वोह रास्ता और डराता है।अब तो झींगुर की आवाज़ के साथ शम्मो की सिसकियाँ भी सुनाई देती हैं।पूरी तरह उजाड़ हो चुके गाँव में कहीं शम्मो की शलवार तो कहीं जम्पर तो कहीं दुपट्टा दिखाई देता है।कभी ज़मीदार की ख़ाली हो चुकी कोठी में पागल टहलते छोटे मियाँ में शम्मो दिखती है तो वीरान मस्जिद की मुंडेर पर बैठी चील की आँखों में शम्मो।हर ज़ुल्म की एक खामोश सज़ा होती है, जो अपने साथ वीरानी,मनहूसियत और हैवानियत लाती है।शम्मो का बाँसवाणी में गायब क्या होना था की,बाँस ने भी फूल दे दिए और पूरा का पूरा गाँव काँटों में बदल गया।

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