लखनऊ में चार दिन के बाद वोह कानपूर चले गए।लखनऊ के यह चार दिन बहुत अहम् थे।कानपूर में भी लोगो से मिलने का सिलसिला चलता रहा।उन्हें तक़लीफ़ थी,मगर काम बहुत बाकि थे।24 अक्टूबर यानि आजकी सुबह कानपूर से वोह दिल्ली आ गए।घर पर डा. ने बीपी चेक किया।बीपी ज़बरदस्त बढ़ा हुआ।
डॉ ने किसी भी हाल में दो महीने बिलकुल आराम को कहा,मगर उन्हें कहाँ परवाह।एक के बाद एक इंतज़ार करने वाले हर एक से मिलते रहे।ठहाकों में डॉ को यहाँ तक कह दिया की तुम लोग डराने वाले लोग हो।मैं इन झमेलों में फसने वाला नही।शाम को दिल्ली में उनकी जनसभा थी।लाखों की भीड़,डॉ के लाख मना करने पर भी उन्होंने अवाम का दिल तोड़ना गवारा न किया।वोह वहाँ गए। वोह तेज़ी से माईक की तरफ बढ़ रहे थे।चेहरा सुर्ख़ था,पसीना लगतार आ रहा था।आज वोह इकट्ठा लाखों की भीड़ के सामने दिल की हर परते खोल देना चाहते थे।दिल था की रुक रुक के साथ चल रहा था।
स्टेज पर पहुँचते ही "रफ़ी क़िदवई,ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद" के नारे गूँजने लगे।उन्होंने बोलना शुरू किया।उनके पहले लफ़्ज़ के साथ ही एक ख़ामोशी दौड़ गई।काँग्रेस के सात सालों के कामो को बताने की झड़ी लगा दी।भीड़ जोश में थी।रफ़ी अहमद का चेहरा सुर्ख़ हो रहा था।करीब सात मिनट बोलने के बाद वोह वहीं गिर पड़े।फौरन ही उन्हें हॉस्पिटल ले जाया जाने लगा।मगर उन्होंने घर चलने का इशारा किया।घर तक रफ़ी अहमद क़िदवई नही पहुँचे बल्कि उनका जिस्म ही पहुँचा।
हर एक खामोश था की सुबह तक इतना ज़िंदादिल इंसान कहाँ चला गया।वोह जो सिर्फ मुल्क़ के लिए जीता वोह कहाँ चला गया।लखनऊ खामोश था की उसमे बिताए वोह चार दिन आखरी थे।रफ़ी अहमद क़िदवई के शरीर को मसौली तक लाने की ज़िम्मेदारी लाल बहादुर शास्त्री की थी।हर स्टेशन पर जुटती भीड़ को सम्बोधित करते हुए वोह टूट रहे थे।वोह रोते और कहते भीड़ नही मान रही है रफ़ी साहब।।रफ़ी आप उठो,आपको लोग देखना चाहते हैं।उठो लोग आपको ही सुनना चाहते हैं।यह लाखों का मजमा रफ़ी अहमद क़िदवई को महसूस करना चाहता है।हर तरफ नम आँखे और अनगिनत सर बता रहे थे की आज कौन ख़ामोशी से अपना सफ़र पूरा कर चुका है।
आपको कभी नही भूलेंगे रफ़ी अहमद क़िदवई,कभी नही,कभी नही।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, October 23, 2016
अवसान
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