Friday, October 28, 2016

अब बस

जी चाहता है इन अखबारों को फाड़ दूँ।नोच लूँ इनमे से खबरें।हर लफ़्ज़ को रेज़ा रेज़ा करके बिखेर दूँ।तब भी चैन नही आएगा।मालूम है कुछ भी कर लूँ,भरे दिल को बहने का रास्ता नही मिलेगा।
जब पढ़ता हूँ की हमारा एक जवान शहीद हुआ।तो यह लफ़्ज़ कलेजा फाड़ देते हैं।दिमाग उस जवान की जगह पूरे परिवार तक दौड़ जाता है।मैं सोच नही पाता की किसी भी जवान का यूँ जाना कितना ज़रूरी है।क्यों ऐसा नही हो सकता की उसकी ज़िन्दगी का मोल समझा जाए।क्यों सरहद पर वोह सिर्फ शहादत का इंतज़ार करें।
एक के बाद एक गिनते गिनते भी सैकड़ा पार हो गया।कोई क्यों नही जवाब देता।हमे अपने सैनिक के बदले दस सर नही चाहिए।उन दस सरों का आचार डालेंगे क्या।हमे हमारे सैनिकों की ज़िन्दगी चाहिए।हमे हमारे जवानो की ज़िन्दगी चाहिए।हमे शहादत का तमगा नही बल्कि हमारी आपकी तरह बूढ़ा होता हुआ सैनिक चाहिए।मौत का दर्द,किसी भी तमगे या कोई भी बात से कम नही हो सकता।कोई भी ईनाम टूटी चूड़ियों की जगह नही ले सकता।कोई भी हाथ बाप का हाथ नही बन सकता।इसलिए कह रहे हैं, उन्हें यूँहीं मत शहीद होने दें।
जहाँ सबकुछ महंगा है,आप सफाई,गंगा के लिए टैक्स तो लगा रहे हैं।इन सबसे बाहर निकालिये।सेना की सुरक्षा के लिए कुछ कीजिये,कोई बोलेगा भी नही इसपर।हम हर चीज़ में सब्र कर सकते हैं मगर सैनिको की शहादत देखि नही जाती।आप पाकिस्तान को मुहतोड़ जवाब दीजिये,मगर उस जवाब में शहादत हमारे हिस्से कम ही आए।यह आश्वस्त कीजिये की जवाब के बाद भी हमारे घरों में चूड़ियाँ न टूटे।सबक ऐसा सिखाइये की बाद तक हमारे बच्चों के सरों से साया न हटे।
रोज़ रोज़ शहादत हमे कमज़ोर करेगी।घर घर से उठने वाली सिसकियाँ दूसरों को सेना में जाने से रोकेंगी।उतावले होकर इन लफ़्ज़ों पर चीखियेगा नहीं।सोचिये,गम्भीरता से सोचिये,की हमारे लिए एक जवान कितना अहम् है।उसकी ज़िन्दगी कितनी अहम् है।उसका होना कितना अहम् है।बस सबकुछ छोड़कर उनकी ज़िंदगियों की हिफाज़त कीजिये।ताकि सिसकियाँ मुल्क़ के अंदर दाखिल न हों।मेरे सैनिक मेरी इज़्ज़त और हिम्मत हैं।अपनी इज़्ज़त और हिम्मत की हिफाज़त हम सबके लिए ज़रूरी है।अब और शहादत हमारे हिस्से में न आए।बस।

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