मैं चाहता था की मेरा घर रेलवे स्टेशन के सामने हो या रेलवे लाइन के सामने।मैं रोज़ आती जाती ट्रेन पर,उससे उतरते चढ़ते भारत पर कहानियां लिखूँ।मेरा घर नदी की किनारे हो तो मचलते पानी और उसमे नहाती औरतो पर लिखूँ।मेरा घर जँगल में होता तो मैं पेड़ो की टकराहट,जानवरो का डर और इंसानी झुँड जो रोज़ ज़िन्दगी को जीतता,उसपर लिखूँ।मैं चाहता था की मेरा घर पहाड़ों पर हो,मैं रोज़ चढ़ते सूरज को कलम दूँ,मेहनत करते आदमी और लबादा ओढ़े बच्चों पर खूब कहानिया लिखूँ।उबलते कहवा और पश्मीना शाल बुनती लड़कियों की नुकीली उँगलियों पर लिखूं।मैं चाहता था मेरा घर समन्दर किनारे हो तो मैं उसमे डूबता सूरज और उठती गिरती लहरों के बीच मछुआरिन पर लिखूँ।
मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ।मेरा घर जँगल,नदी,पहाड़,समन्दर,ट्रेन सबसे दूर मैदान में घनी आबादी के बीच था।नदी के नाम पर तालाब और पहाड़ के नाम पर मिटटी के टीले, समन्दर के नामपर कुँए,ट्रेन के नामपर रोडवेज की खटारा बसें थीं।
मेरी कहानी इन्ही के इर्द गिर्द रह गई।मेरे लफ़्ज़ पसीना टपकाती सकीना और तालाब से मिटटी निकालती पूजा पर ही अटक गई।मेरे लफ़्ज़ डंडे से टायर ढकेलते बच्चों और छप्पर में बीड़ी पीते बुड्ढों में ही खर्च हो गए।पश्मीना शाल बुनती कश्मीरी लड़कियों की जगह फटा तहमद पहने जुलाहे के करघे पर कलम ने दम तोड़ दिया।उबलते कहवा की जगह मट्ठे की हांडी आ गई।इस तरह एक महान रचना करने का ख्वाब मिटटी,गर्दे,,भीड़,तक़लीफ़ में दब कर खत्म हुआ।
जो लिखना था तो वोह दूसरे लिखते रहे।मैं पढ़ता रहा।मैं अपनी चूने से पुती दीवार की मुँडेर पर बैठ कर अपने इर्द गिर्द ही अल्फ़ाज़ उधेड़ता रहा।इतना उधेड़ा की अल्फ़ाज़ ने मेरे मुँडेर पर बैठे बैठे ही ज़ायका छोड़ दिया।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, October 5, 2016
यह होता तो मैं होता
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hafeezkidwai
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