दोनो के होंट बेहद गुलाबी थे और बहुत बारीक़ से।लगता जैसे किसी ने सफेद बुत के चेहरे पर कलम से सुर्ख़ लकीर खींच दी हो।।इनकी आँखे बड़ी और तेज़ थीं।काली चमकदार पलकें अमूमन झुकी रहती मगर जब यह ओस से भीगी पलकें उठती तो अच्छे अच्छे गिर जाते।दोनों के बदन खूबसूरती की हर नोक पलक पर बराबर उतरते।
ऐसे में नक्काशीदार संगेमरमर की चार दीवारों में इन दोनों की खूबसूरती के किस्से अच्छों अच्छो को गुलाम बनाए हुए थे।कोई इनके बालों में उलझा था तो कोई आँखों में डूबा था।हो न हो हर एक को बाँधने का कुछ न कुछ इनके जिस्म में तराशा हुआ था।बड़े वक़्त के बाद दोनों बेगमो को खूबसूरती से तौलने पर एक सा वजन आया तो सवाल हुआ कौन है अव्वल।तो किसी फ़ालतू से इंसान ने कहा इनमे जो मिजाज़ में ज़्यादा नाज़ुक हो वोह है अव्वल खूबसूरत।दोनों से नाज़ुक होने के सवाल नवाब ने दाग़ दिए।
पहली बोली की, हुज़ूर मेरा गला बैठा हुआ है, ज़बर्दस्त ज़ुकाम है।नवाब ने पूछा ज़ुकाम कैसे हुआ,तो वोह बोली हुज़ूर रात गए मेरा पाँव मूली के पत्ते पर पड़ गया था,जिससे यह जिस्म ठण्ड का शिकार हो गया।नवाब ने कहा, ओह,तुम ही हो अव्वल दर्जे की खूबसूरत ए मेरी बेगम और मुस्कुरा कर दूसरी को देखा,
तो वोह तक़लीफ़ में बोली मैं क्या कहूँ हुज़ूर रात से पीठ ही नही टिक रही दर्द में,नवाब ने कहा आपको क्या हुआ।तो उसने नवाब का हाथ अपनी पीठ पर रख दिया।पीठ पर उभरे हुए बरेते(कोड़े का निशान) को देख सिहर गए।यह क्या है बेगम।बेगम ने कहा गई रात मेरे बिस्तर की तहों के नीचे किसी कमबख्त का बाल पड़ा था।यह उसी का निशान है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, December 23, 2016
नाज़ुक
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hafeezkidwai
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