Wednesday, December 28, 2016

बूढ़ा सूरज

सूरज कोहरे में खोया हुआ है।इसे नही मालूम की आने वाली सुबह किस बेसब्री से इनका इंतज़ार कर रही है।सफेद रुई नुमा हवाएँ फ़िज़ाओं में उड़ रही हैं।कभी गाल,कभी नाक तो कभी बालों में उलझकर उनके रँग हल्के कर रही ओस की बूंदे नारंजी सूरज की किरणों तक बिखरी पड़ी हैं।
सूरज जैसे ज़िम्मेदार,निष्ठावान,बलवान को यूँ कोहरे और ओस से हारते हुए देखना बुरा लग रहा है।उसे पता है की उसकी एक मज़बूत किरण एक झटके में ओस और कोहरे को पानी में,फिर पानी से भाप में,भाप से उसका वजूद खत्म करके रख देगी।मैंने सूरज को मई जून में गुरूर से ठहाके लगाते देखा था।पता नही यह दिसम्बर उसे इतना कमज़ोर क्यों कर देता है।
अक्सर जाते हुए साल में मुझे सूरज बूढ़ा लगने लगता है।सुबह सुबह तारे उसे दोनों हाथों से पकड़ कर लाते हैं।चाँद पीछे से सहारा देता है।आसमान मुलायम हो जाता है।सूरज कराहता हुआ झुर्रियों के साथ एक दो किरणों को ज़मीन पर भेजता है।किरणे भी बुढ़ापे में कोहरे और ओस से हाथ पैर जोड़ती हुई ज़मीन तक पहुँचने की इल्तिजा करती हैं।बेहद हस्सास ओस को तरस आ जाता है और वोह रास्ता छोड़ देती है।
सबको पता है कमज़ोर सूरज कल फिर घमण्ड से ज़मीन का पानी सुखा देगा।लेकिन सबका दिल सूरज की तरह सख़्त थोड़े ही है।सबके दिल में अथाह नरमी है,उसके दिल में अथाह गर्मी।

No comments:

Post a Comment