किराये का मकान आपकी ज़िन्दगी को संवार देता है।मैं लोगों को देखता हूँ जब वह मकान बदल रहे होते हैं तब बड़े फिक्रमन्द होते हैं।एक जगह से दूसरी जगह जाना कठिन भले हो मगर ज़रूरी है।किरायदार हमेशा एक ज़िंदा इंसान होता है जो हर घर के हिसाब से खुद को ढालता है।अगर आप अपने मकान में रह रहे हैं तो यह समझ लीजिये आपके दिमाग के काफी हिस्से मरे पड़े हैं।वह हिस्से जो आपको भूगोल,परिस्थिति,वातावरण से लड़ने की ताक़त देते।जब आप घर बदल रहे होते हैं तो सालों से जमा गैर ज़रूरी समान को आप छाँटते हैं।जब उन्हें उठाते हैं तो उनसे जुड़ी यादों को टटोलते हैं।उस एहसास को जीते हैं जब यह सामान आपकी चौखट पर आया था।
किराये का मकान आपको संघर्ष का साथी बनाता है।आपको दूसरों में घुलने मिलने की कला सिखाता है।एक अंजान डर के लिए लड़ने को हमेशा तैयार रखता है।
हो सकता है कुछ स्कवायर फिट ज़मीन के टुकड़े को अपना कहकर आप सुकून में आ जाएँ।मगर यह याद रखिये,हमेशा चलने वाला ही ज़्यादा खुश होता है।वोह ज़िन्दगी के हर मसाले का ज़ायका लेता है।वोह हर बार बदलते पड़ोसियों में खुद को छोड़कर आता है।नए रिश्ते गढ़ता हुआ किरायदार किसी मालिक से ज़्यादा अपने बना लेता है।
मैं सिर्फ इतना कहता हूँ की अपने आस पास देखो।हर एक के होने को देखो।उसकी ज़िन्दगी को तौलो।उसमे खुशियों और गम के छौके को महसूस करो।उनकी ज़िन्दगी की कश्मकश को करीब से देखो।
तुम्हे तुम्हारी ज़िन्दगी की खुशियों के बहुत से रास्ते मिल जाएँगे।किरायदार को अब देखना।उसमे चलती फिरती परम्परा का एक सिरा पकड़ना।देखना इनके कदम,इनकी जड़ों को कहाँ कहाँ फैला रहे हैं।एक किरायदार धीरे धीरे बरगद बन कर छाता है।किरायदार अपना पावदान छोड़कर सारी ज़मीन को अपना कर लेता है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, December 3, 2016
किरायदार
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hafeezkidwai
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