Friday, December 9, 2016

यह भी याद रखें

जिस नक़ाब,जिस तलाक़ का तुम लिजलिजा सा विरोध करके आराम से स्त्री विमर्श और फेमिनिज्म के स्टूल पर बैठ जाते हो,उससे उठो।उसपर उसी के बैठने का हक़ है जो घर की दहलीज़ से अनंत आसमान तक हक़ के लिए लड़ रहा है।मैं उनको सलाम करता हूँ जो आजभी मेहनत से बराबरी के लिए,आज़ादी के लिए जूझ रहे हैं।मेरे शब्द केवल उन खोखले लोगों के लिए हैं जो तंज बोलकर सिर्फ तमाशे देखते हैं।
तुम्हारा विमर्श चिढ़ाने वाला है।यह निर्माण का रास्ता नही है।तुम नकारात्मक्ता से भरकर सिर्फ तंज करते हो मगर रास्ता नही सुझाते।रास्ता सुझाव कैसे,शकुनि का काम रास्ता दिखाना कभी रहा ही नही,वोह तो सिर्फ उलझाना जानता है।
हाँ अगर पर्दा,तलाक़ के विरुद्ध वाक़ई दिल से हो तो रुक़य्या को पढ़ो।अब पूछोगे की कौन रुक़य्या।रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आज 9 दिसम्बर है।आजही 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।उन्हें याद रखना होगा।उनके काम को परखना होगा।उनके बनाए रास्तों को साफ़ करना होगा,जो तुमसे पहले इतना कर गईं हैं जितना तुम सोच भी नही सकते।
हर आवाज़ उठाने से पहले,अपने से पहले आवाज़ उठाने वालों को देखो,उनकी कमियों,मज़बूतियों,तरीकों को देखो।सब कुछ बेहतर बन जाएगा।तंज और फ़िकरा कसने से कभी रास्ते नही बनते,यह याद रखना।
उठो और कमसेकम आजके दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।

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