अब अगर पूछा की शादी क्यों नही कर रहे हो,तो जान लो या तो तुम अपने दिन पूरे कर चुकी होगी या फिर मैं।।क़त्ल और ख़ुदकुशी में बड़ा बारीक़ फासला रखा है।रोज़ रोज़ एक ही सवाल,शादी।अरे क्यों करे शादी,ज़िन्दगी तो यूँहीं गुलज़ार है, उसे यलगार में बदलने का हमे कोई शौक़ नही।।
जब मैं यह बक रहा था तब वह एक थके से अख़बार में मुस्कुरा कर 'वधु चाहिए' वाले कॉलम में मेरे नाम की गलत स्पेलिंग पर ऊँगली रखकर इशारा कर रही थी।खीज कर मैंने कहा यह मेरे दुश्मनों की चाल है, मुझे बदनाम करने की।।तब उसने कहा आपके दुश्मन भी कितने लाजवाब हैं और यह कहकर मेरे ज़ख्मो पर मुट्ठी भर नमक छिड़क दिया।छिड़क क्या बल्कि धर कर रगड़ दिया।
कल फिर जब तुमने इशारों में शादी का वाहियात सवाल दागा तो मैं धूप में खड़ा तुम्हारे घर के सामने चीखा की क्या कोई बादशाह अकबर हूँ की मुगलिया सल्तनत को चिराग देने हैं या कोई राजस्थान की रेत का राणा हूँ की कुल के बगैर कुछ नही रह जाएगा।मुझे शादी करनी ही नही है।अपने जैसा एक और नमूना संसार को देने की मैं ज़रा भी हिमाकत नही कर सकता।
पता नही कहाँ से आकर एक चप्पल पीठ पर पड़ी,देखा उधर वह दूसरी चप्पल हाथ में लिए चीख़ रही है।अरे कमबख्त,हवसी शादी करने को कह रहें,बच्चों की लाइन लगाने को नही कह रहें।मुगलिया सल्तनत नही लेकिन क्या कमीने ऐसे एक अदद ताजमहल नही बना सकते।शादी करलो,हमी से करलो,इतना प्यार करूँगी की तुम्हारा ताजमहल बनाना पड़ जाएगा।अबे कोई तो घाँस नही डाल रहा,मैं ऑफर कर रहीं हूँ मान लो,साईं बाबा बार बार मौका नही देते और एक मौका हर निठल्ले को देते है, छीन लो मेंरा हाथ पप्पा से।
मैं चौराहे पर इतनी फ़ूहड़ तरीके से मोहब्बत और शादी के प्रपोज़ल को सुन बेहोश ही होने वाले थे की दूसरी चप्पल आकर पड़ी,साथ में सवाल की आखिर इतना सोच क्यों रहे हो,कौन मुगलिया सल्तनत से हो की लाइन लगी है।जो मिल रहा लेलो,मुझे भी तुम्हारे साथ अपने करम फोड़ने है।
मैंने दोनों चप्पल उठाई,अपने नँगे पैरों को पहनाई,और मुस्कुराकर उसके सामने रखी चाय की दुकान के टूटे स्टूल पर बैठ कर तीन कुल्हड़ चाय पी।हम एक दूसरे को लगातार देखते रहे।आँखों से बाते होती रहीं।स्टूल से उठ रहे थे की उसमे घुसी कील ने साले की तरह ज़ख्म पहुँचा दिया,एक दर्द सा निकला उधर वह आधे छज्जे पर लटक गई की क्या हुआ,मैं उठ चुका था और वह हमारे जवाब के इंतज़ार में खड़ी थी,मैंने चीखकर कहा "चल घुस" और निकल लिया।जाते जाते पीठ पर एक और चप्पल पड़ी,मगर वह टूटी थी,किसी काम की नही।
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