आइये आपको ले चलें नरम नरम हरी घाँस पर।भीगी भीगी मिट्टी पर पाँव रखते हुए ऊपर ले चलें।इतना ऊपर जिसमें रूह तो ऊपर जाए ही,जिस्म भी हल्का महसूस करे।आज कुछ लोग साँस धीरे और तेज़ छोड़कर आपका काफी कुछ ढीला कर देंगे।जो अपनी ज़बान,किरदार से सिर्फ तोड़ने का काम करता हो वह मेरे मुल्क़ की हज़ारों सालों की परम्परा,योग को कैसे कर सकता है।अगर योग आपकी आत्मा को शुद्ध नही कर रहा यो वह केवल छदम् योग है।
आइये हम उस योग की तरफ ले चलें जो सदियों से सादगी से हमारी खूबसूरती को निखरता रहा हैं।इसमें ॐ या आमीन का झगड़ा नही है।न सियासत है न कोई चालाकी।यह ख़ालिस हमारी और हमारे मुल्ककी सेहत का योग है।योग की आठ क्रियाओ में इंसान को जुड़ने को कहा गया है नाकि तोड़ने का।यह योग रूह को जोड़ता है।पहले है यम यानि बुरे काम छोड़ना,अब आपको बुरे काम को तो बताना नही पड़ेगा ।उसके बाद आता है नियम यानि अच्छे कामो को करना,खूबसूरती से इन्हें अंजाम देना ।
फिर आता है आसन, जिसमे शरीर को दुराग्रहों,बीमारियो से बचाना है यह बीमारिया नफ़रत की हैं।फिर प्राणायाम है, जिसमे साँसों पर संयम रखना है,हर ऊँचे नीचे पर संयम। फिर है प्रत्याहार, जिसमे अपने दोषों को दूर करना होगा अगर आपको आपके दोष बताने पड़े तो घर के आईने तोड़ दीजिये।उसके बाद आती है धारणा, जिसमें चित्त पर ध्येय लगाना है।अगला क़दम है ध्यान,जो वही लगा सकता है जिसके सफेद दामन में झूठ, मक्कारी, ख़ून ख़राबा,धोखा न दिया हो,वरना ध्यान के पहले ही चरण में आपका नँगा चरित्र आपके ध्यान को तोड़ देगा।
अष्टांग योग का अंतिम चरण है समाधि यानि स्थिर हो जाना यह तभी सम्भव है जब आपके दिल में किसी दूसरे के लिए नफ़रत न हो,बदले की आग न हो।वैसे यह योग कठिन है इसलिए लोग उस योग को थाम लेते हैं जो योग नही घटाओ है।एक सच्चा योगी कोमल हृदय का होगा,उसकी ज़बान ईश्वर की ज़बान होगी,जिसमे गाली, अपशब्द,नफ़रत का कोई स्थान नही होगा।यह योग त्रिशूल या तलवार से,क्रिया की प्रतिक्रिया से नही चलता यह विशुद्ध योग है।
यह एक शब्द पर नही टिका है, यह पूरी परम्परा है जो गँगा को जमुना से जोड़ता है।यह मेरे दिल से आपके दिल से होता हुआ ईश्वर तक जाता है।इसलिए इस रास्ते को वह अपनाए जिनके दामन बदबूदार न हों, जिनकी बुनयाद नफ़रत पर न हो,जो दिलों को बाँटता न हो।यह है हमारा अष्टांग योग।यही है भारत की मूल परम्परा।आइये मिलकर करें नरम नरम घाँस पर दिलों को जोड़ने वाला योग।मुझे गर्व है की मेरे गुरु हरिशंकर शुक्ला यानि गुरु जी ने योग को तो बचपन में ही जिस्म में उतार दिया था साथ ही एक मन्त्र दिया था की जहाँ कहीं जाना मोहब्बत,नरमी से रहना।योग तुम धैर्यवान बनाएगा।मेरे लिए आज भी वही पतंजलि के बाद की परम्परा के हैं।वह बाजार,व्यापार से दूर सिर्फ रूह को खूबसूरत बनाने वाले लोग थे।आज नरम घास हमारे दिल को नरम करदे तो सब सफल वरना यह धारावाहिक चलता ही रहेगा।।।।
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