Tuesday, June 6, 2017

किसान पर गोलिया

तुम्हे मरना ही होगा।तुम्हे क्या लगता था की ज़मीन का सीना फाड़कर उसमे अपने बहते पसीने को डालकर जब तुम कुछ उगाओगे तो उसका तुम्हे ईनाम मिलेगा,दुनिया तुम्हे सर आँखों पर लेगी।अगर तुम ऐसा सोचते थे,तो तुम शुरू से ही गलत थे।तुम अगर चमकते सूरज से बच गए अगर तुम बाढ़ से बच गए तो भी तुम्हे मरना होगा।हम मारेंगे ताकि तुम्हे मोक्ष मिल सके।

तुम्हे इतना तो सोचना ही चाहिए की अगर कोई एक शब्द "किसान" लिख दे तो यह बेतहाशा भागती भीड़,उस पोस्ट को पढ़ती भी नही।तुम्हारे नाम से किसी को कोई संवेदना नही।तुम एक बेहद गैर ज़रूरी लोग हो।यक़ीन न हो तो अपने घर में अपने ख़ून से उपजे बच्चों को देख लो,यह भी देख लो वोह इस वक़्त किसकी भीड़ हैं।तुम्हारे खुद के बच्चे,जिन्हें तुम अपनी खाल घिस घिस पढ़ा रहे हो,वोह कॉलेज में लेटकर तुम्हारी ही खाल से हन्टर बनाने वालों के गुणगान गा रहे हैं।अगर बाकि लोग तुम्हे तवज्जे नही देते,तो उसमे गलत क्या है।

मुझे याद है जब दो साल पहले,यहीं लखनऊ से पचास किलोमीटर दूर मायाराम किसान ने आत्महत्या की थी तो उसके आगरा में पढ़ने वाले बच्चे से मिला था।बेतहाशा बिखरे हुए परिवार को देख दिल बैठ गया था।बिना कुछ सोचे एक अपील की मायाराम के लिए और लोगों ने बिना सोचे उसके बच्चे के अकाउंट में हज़ारों रूपये डाल दिए।मैं मायाराम की तरह टूट गया जब उसके लड़के ने कहा की हमे नही पता था की आप मुसलमान हैं।

यह शब्द मेरे कानों में सालों गूंजते रहे।मैं तब भी उसकी फ़ीस का यह सोचकर इंतेज़ाम करता रहा की मायाराम मरते वक़्त सिर्फ यह कह रहा था की उसका बेटा इंजीनियर बन जाए।मैंने उसके लड़के की आखरी पढ़ाई के वक़्त कंधे पर हाथ रखकर कहा था की हो सके तो किसान बनना,किसान हिन्दू और मुसलमान नही होता।उसका अनाज हर पेट को भरता है।उसने आँख नीची किये हुए हामी में सर हिलाया मगर हमे पता है चार मुलाकाते नस्लों में डाले गए ज़हर को नही मार सकती।

खैर इस तरह के सैकड़ों बच्चे हैं।आज वह सब किसानो को ही दोष दे रहे होंगे।उनकी मौत हम पर रत्ती भर असर नही करती।उनकी ही क्या,हमे तो अब किसी की भी मौत पर ग़म नही होता।वीडियो गेम चल रहा है।उसमे हर मौत पर ठहाके लगाने वाली जेनरेशन यहाँ हर मौत पर मुस्कुरा रही है।मुझे अफ़सोस है की जिनके परिवार में किसान रहें हैं वह भी खामोश हैं।पता नही कैसे हलक से अनाज उतर जा रहा है।पता नही कैसे हमे हमारे खाने में किसानो का ख़ून नही दिख रहा है।हम तो इस क़द्र वाहियात हैं की उनकी उपज का सही मूल्य नही दे सकते मगर गोलियों से उन्हें मारकर उनकी लाश का मूल्य दे देते हैं।
अब किसानो की फसल से अच्छी कीमत उनकी लाश की है।सबको लाश ही बना दो।हम सब लाश ही तो हैं।

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