एक बार शैतान ने एक इनसान को बहकाने की कोशिश की।उसे बहुत तरह बहकाया,फुसलाया,फसाया मगर वो उसकी चाल में रत्ती भर ना आया।इंसान शरीफ था साथ ही खूबसूरत दिल का मालिक तो उसपर शैतान का एक भी जादू न चला।आख़िर में झल्ला कर शैतान ने उससे कहा की अच्छा यार मेरा एक़ मामूली सा काम तो कर दोगे ना।
उस इंसान ने हमदर्दी खाकर हांमी भर दी और पूछा क्या करना है ।झट से शैतान ने पास में हलवाई की कढ़ाई में जलेबी के लिए तैयार हो रहे शीरे में ऊँगली डाली और कहा ये लो शीरा और इसे बस जुम्मन की दुकान की दीवार पर लगा दो।उसने ऐसा ही किया एक बूँद शीरा दीवार में लगा दिया और पूछा इससे क्या होगा?यह क्या फ़ालतू का काम था।
तो शैतान ने कहा चलो दूर बैठ के देखते हैं।कुछ देर बाद शीरे पर कई सारी मक्खियाँ आकर बैठ गयी।मक्खियों को देख छिपकली उसे खाने आ गयी।छिपकली दुम हिलाती उधर पहुंची,मक्खियाँ तो उड़ गईं मगर छिपकली पर कहीं से एक बिल्ली लपकी।बिल्ली को देख पास ही टहल रहे शुक्ला जी का कुत्ता उस पर टूट पड़ा।कुत्ते के कूदने से मिठाई की थाल जो गिरी तो गिरी,जुम्मन हलवाई का पारा सातवें आसमान पर।जुम्मन ने कुत्ता देख गाली गलोज शुरू करदी।बहस करते करते कुत्ते के मालिक शुक्ला जी का कॉलर पकड़ लिया।
यह बात दूर क़स्बे तक फैल गयी की एक जुम्मन ने हमारे शुक्ला जी पर हाथ उठाया।उसकी इतनी हिम्मत की हम पर हाथ उठाए।हम क्या अब इन जुम्मन से दबकर रहेंगे।दूसरी तरफ इसकी भनक पहुँची तो उधर भी पूरी क़ौम जुम्मन की टोपी के नीचे आ गई।एक तरफ की भीड़ जनेऊ के धागे में बंध गई तो दूसरी तरफ टोपी में सिमट गई।पूरा शहर आग के हवाले हो गया,दोनो तरफ के सैकड़ो मासूम मार दिये गये।जले घरों से उठता धुआँ देख शैतान ठाहाके मारकर हँसा और वो इंसान अपनी ऊँगली पर लगा शीरा देखता रह गया।जैसे हम लोग अक्सर सब मिटने के बाद देखते रह जाते हैं, ठीक वैसे ही,ठहाके और चीखें उसे शून्य की तरफ ले जा रही हैं......
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