हम लगातार चढ़ रहे थे ।सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ रहे थे ।आकाश ,जिसे छूने की तमन्ना थी,हम लगातार उसकी और हाथ बढ़ाते दौड़ रहे थे ।हर वह सीढ़ी जो विज्ञानं से जाती थी,कला से जाती थी,संस्कृति और शिक्षा से जाती थी,मूल्यों और समानता से जाती थी,प्रेम और भाईचारे से जाती थी,सबको पार करके हम चढ़ते जा रहे थे ।
इस चढ़ान में नही देख पाए,बिल्कुल नही देख पाए की हमारी सीढ़ी कितनी मज़बूत है ।हम सब चढ़ते हुए सीढ़ियों की में शुरू से लगी दीमक नही देख सके ।सीढ़ी के सबसे नीचे के हिस्से में लगी वह दीमक जो आज़ादी के मुश्किल से दो दशक पहले लगी थी,हम सबने दरकिनार किया ।
नतीजा यह हुआ की बीच रास्ते से हम आकाश को छूने की ख्वाहिश लिए मुँह के बल लुढ़कते आ रहें हैं ।इस लुढ़कने पर भी देखिये जिन सीढ़ियों से हम चढ़ रहे थे,वह सब दीमक चाट चुकी हैं ।अब कोई सीढ़ी हमारे वज़न को बर्दाश्त करने लायक ही नही रही क्योंकि दीमक हर सीढ़ी को अंदर से चाट चुकी है ।हम रोज़ गिर रहें हैं, गिरते ही जा रहें हैं, अब यह गिरना पाताल लोक में खत्म होगा या उससे पहले,मालूम नही ।इस गिरते में एक ही अफसोस है की दीमक को दीमक क्यों नही समझा उसे संस्कृति का सेवक क्यों समझा ।
यह छदम् अनुशासित,संगठित दीमक अपना नब्बे प्रतिशत काम कर चुकी हैं फिर भी दस प्रतिशत का ख़ौफ़ उन्हें मालूम है ।यह आज जागे तो कल से दीमक का सर्वनाश शुरू हो जाएगा क्योंकि वह कायर है, कपड़ों में छुपी रहती है,अक्सर धोती पैजामो में छिपती है,उसे छिपना पड़ता है क्योंकि आज भी समाज दीमक को स्वीकार नही करेगा,इसलिए वह छिप छिप कर मक्कारी से मज़बूत चीज़ को चाट चाट खत्म करती है।
अब गिरने वालों उठो और आकाश की ओर देखो ज़रूर मगर दीमक का इलाज करके ताकि लम्बे वक़्त तक ऊंचाई का मज़ा लो।
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