आईने के सामने खड़ा खुद को देख पूछ रहा था की मैं कौन हूँ ।सवाल सुनते ही आईना चटख कर बोला मेरी क्या दुनिया की नज़र में देखो तुम हो क्या ।कमबख्त नज़र जब बाज़ार हुई तो खुद को कस्टमर पाया ।नज़र बदल कर बाबाओं की हुई तो खुद को भक्त पाया ।नज़र जब राजनीति के चश्मे में डूबी तो खुद को वोटर पाया ।
नज़र जब सरकारी हुई तो खुद को लाभार्थी पाया ।जब स्कूल का रुख किया तो विद्यार्थी पाया ।यही नज़र जब मालिक की हुई तो खुद को मज़दूर पाया । नौकरी वालों की नज़र में बेरोज़गार था ।नौकरी के कभी न पूरे होने वाले प्रयास देने वालों की नज़र में अभ्यर्थी था ।मज़हब में डूबी नज़र के सामने काफ़िर था ।खास मज़हब से चिढ़न वालों की नज़र में जेहादी था ।
यह अजब दुनिया थी जिसकी नज़रों में मैं वैसा ही था जैसा उनकी नज़र दिखलाती ।लेखक की नज़र में मैं पाठक था,फिल्मिस्तान की नज़र में दर्शक,कवि की नज़र में श्रोता तो एक आमजन की नज़र में भीड़ था ।मैं संविधान की नज़र में तो नागरिक भी था ।बाँटने वालों की नज़र में मैं बहुसंख्यक था या अल्पसंख्यक था,पिछड़ा था या अगड़ा था,मलेच्छ था या शुद्ध था मगर इंसान नही था ।क्या यह सिर्फ मैं था जो मैं नही था बाकि सब था ।टूटे आईने की आख़री किरच मुस्कुरा के बोली आज से कुछ की नज़र में तू अर्बन नक्सली भी तो है ......
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