Monday, October 14, 2019

कलाम जन्मदिन

और एक रोज़ वह चले गए ।जैसे कोई बच्चा घाँस से हरे भरे मैदान में खेल रहा हो और फ़रिश्ते उसका हाथ पकड़ आहिस्ता आहिस्ता खेलते हुए ही दूर बहुत दूर आसमान तक लिए चले जाएँ । जहाँ से वह दिखे भले न मगर उसके क़हक़हे यहीं ज़मीन पर मौजूद गूँजते रहें ।

कलाम मेरे दोस्त,मेरे उस्ताद,मेरे मुर्शिद,मेरा इश्क़,मेरा ग़ुरूर,मेरा वजूद ऐसे ही हवा में सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इतना ऊपर चले गए की अब बस किस्से और बातें ही यहाँ रह गईं ।

एक ऐसी शख्सियत जिसका जन्मदिन जयंती में बदलते देखा है हमने,एक ऐसी रूह जिसका किसी पर कोई ग़म,कोई बदला,कोई तक़लीफ़ बाक़ी नही । मैं कलाम को ज़िन्दगी में उतारता चाहता था,उनकी क़ाबलियत नही बल्कि सादापन,अथाह भरे होने के बावजूद ख़ालीपन, तमाम ऊँचाइयों के बाद भी ज़मीन पर मौजूद रहना ।

कलाम हाँ मैं जी या साहब लगाकर कभी अपनी खुद की रूह को ख़िताब नही करता ।कलाम के चेहरे पर बिखरी यह सफ़ेदी मुझे ख़ूब लुभाती थी,जिससे जवानी में ही बूढ़ा होने की अजीब खब्त सवार रही । ख़ैर कलाम सुबह के बाद अब ढंग की दो प्याली चाय मौजूद है और सामने ही 2020 का भारत भी नज़दीक़ है ।

आइये और चाय पीते पीते ख़ुद को इसमें ग़र्क करदें । देखते हैं यह दिलों को जोड़ने वाला साल होगा या तोड़ने का,यहीं से कलाम का युग शुरू होगा,इतना तो यक़ीन है ।प्रेम,त्याग,समर्पण,सादगी और तरक़्क़ी का युग । कलाम को मैं वैज्ञानिक से ज़्यादा एक भला इंसान मानता हूँ, वह सीधे और सरल थे,उनमें गुरु और शिष्य दोनों साथ रहे,ताउम्र,वह काम करने आए और काम करते ही हुए इस दुनिया पर अपनी मोहर लगा कर चले गए । वह मोहर मेरे दिल पर भी इतने गहरे तक धँस चुकी है कि सोने नही देती कलाम,आपकी यह मोहर कहती है कि एक दिन हम सुधरकर इंसान बन जाएँगे, तब विज्ञान मुस्कुराएगी...

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