Friday, October 18, 2019

मजाज़

आहिस्ता बोलिये,ज़िन्दगी भर जागने के बाद अब ये सोए हुए मजाज़ हैं । काश अब यहाँ बिखरा हुआ सुक़ून उस सदी की सबसे बेचैन रूह को जागते हुए मिल गया होता । मैं मजाज़ की नज़्मो से दूर वहाँ खड़ा हूँ जहाँ वह अपनी सबसे अज़ीज़ बहन सफ़िया अख्तर के हाथ पर सर रखे हुए सोए हैं ।मैं मजाज़ के उस सब्र को देख रहा हूँ जब सफ़िया आपा ने जाँनिसार अख्तर को पसन्द किया । ज़माने को मुट्ठी में करने वाला मजाज़ बहन के इस क़दम को रोक नही सका ।बस इतना कहा देख लो,जाँनिसार आँधी है ।

एक तरफ़ मजाज़ का दिल था,जिसे सब समझते थे मगर समझ कर समझना नही चाहते थे तो दूसरी तरफ़ सफ़िया थीं,जिनका दिल जाँनिसार जैसी आँधी को ज़ब्त करके भी, खामोश भाई की सरकती ज़िन्दगी देख रहीं थीं ।
आज मजाज़ की पैदाइश है, सफ़िया जानती थीं की मजाज़ को ज़ाफ़रानी रवे का हलवा और परतोंदार पराठा पसन्द है ।मजाज़ के हर शौक़ को उसका पूरा परिवार जानता है ।देर रात तांगे वाला जब मजाज़ को किसी बुझ चुकी महफ़िल से उठा कर लाएगा तो बारामदे में तकिया के नीचे उसका किराया रखने वाली मजाज़ की माँ भी जानती हैं की मजाज़ का दिल भरा है मगर जेब ख़ाली है ।

यह पाँच कब्रें हैं, यह एक दौर की अजब नक़्क़ाशी हैं । जो रिश्ते ज़िन्दगी भर एक दूसरे को समझने में उलझे रहे,वह यहाँ सुक़ून से सुलझे हुए सो रहें ।ख़ैर कितना लिखे और क्या क्या कहें,जब भी कब्र पर हाथ रखता हूँ तमाम दस्तावेज़ वरक़ दर वरक़ खुलने लगते हैं ।

मजाज़ का जन्म आजके दिन का है और मृत्यु भयँकर सर्द रात की है । ज़ाहिर है जो अक्टूबर के खूबसूरत दिल का मालिक हो,वह आती ठिठुरन को गले तो लगाएगा ही और एक दिन यह बर्फ सी ठंडक दिल की गर्मी को भी जकड़ लेगी,किसने जाना । मजाज़ नही रहे,वह तो दो दिलों की नफरत से बेचैन बेचैन घूमते फिरते,अगर आज होते तो क्या होता । जब कोई मजाज़ से पलट कर पूछ लेता की बताओ,तुम्हारी देशभक्ति क्या है, मजाज़ का जवाब इस सदी की सबसे ताक़तवर नज़्म होती,जिसके पीछे हम सब छिपकर अपनी ताकत का हुल्लड़ मचा रहे होते,मगर न अब मजाज़ हैं और हवाएं गर्म हो रहीं हैं, दिल मुर्दा....

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