आप चमचमाती गाड़ी लीजिये,भले ही उसमें किसी को मत बैठाइए, गाँव वाले आपकी तारीफ के पुल बांधेंगे । अब बड़ा हवेली नुमा घर बना लीजिए,भले ही उसमें किसी को घुसने मत दीजिये,आपके रिश्तेदार आपके किस्से सुनाएंगे अपने बच्चों को । आपकी चमक,आपकी दौलत,आपकी शोहरत गांव वालों और रिश्तेदारों और नज़दीकियों को आकर्षित करती है । आप उनसे सीधे मुँह बात मत कीजिये मगर वह आपके टेढ़े मुँह की तारीफ़ की झड़ियाँ लगा देंगे ।
वहीं आपका घर कच्चा हो,गाड़ी के नाम पर बस कोई गाड़ी हो,खाने भर की दौलत हो,फिर भी आप दिन रात अपने गाँव वालों,रिश्तेदारों,नज़दीकियों की मदद करते रहें । आपकी कोई कदर नही होगी । कहिये तो देर सवेर दुत्कार दिए जाएं । आपकी सेवाओं के किस्से अपने बच्चों को सुनाकर उन्हें कोई बिगाड़ेगा नही । कोई परिवार नही चाहेगा उनका बच्चा आपसा बनें ।
गणितज्ञ वशिष्ट नारायण जी हों या कैफ़ी आज़मी,किसका गांव वालों ने स्वागत किया है । यह अगर बाहर रहते,चमकते रहते,तो इनके किस्से इनके गांव में घर घर कहे जा रहे होते मगर नही,यह गांव लौट आए माटी के प्यार में और माटी हो गए ।
मुझे न समाज से शिकायत है और न ही कोई उम्मीद है । अपना काम करते जाओ और करते करते मर जाओ । यही हम सबकी किस्मत है । कोई नही याद करता सेवा करने वालों को,कोई नही चाहता उनका बच्चा चमकती ज़िन्दगी छोड़कर दूसरे का मददगार बने । हमे भगवान राम चाहियें मगर मन्दिर में या तो पड़ोस में,अपने घर मे नही,जो सौतली मां के वचन की भी लाज रखे ।
हम एक समाज के रूप में बस समाज हैं । अच्छे बुरे को क्या ही कहें । जो समाज नेहरू के पहाड़ जैसे कामों को झुठला दे,उस समाज मे बस एक ही सूत्र है, काम करो,काम करते हुए मर जाए,पहाड़ से रेत बनकर किसी के पैरों के नीचे दबकर खत्म हो जाओ,बस । पलकों पर बैठाने की बारी आएगी तो एक से एक हल्के लोग भी इनकी पलकों पर बैठकर महान हो जाएँगे । वशिष्ट नारायण जी हो या जब्बार भाई,तिश्ना आलमी हों या प्रोफेसर जीडी अग्रवाल,सबको यूहीं मर जाना है, हमे और आपको भी....
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