Monday, November 18, 2019

हिटलर

घुप धुएँ में एक काया उभरी,धुएँ में कुछ समझ न आया । धुँधलके में स्पष्ट कुछ दिखाई नही दिया,फिर भी कुछ लोगों ने कहा वह काया नही, हिटलर हैं ।

बहुत से लोग अनसुना करके धुएँ में क़रीब गए । वह लोगों की पहली अवधारणा के खिलाफ थे । धुएँ को चीरकर बतलाना चाहते थे कि वह हिटलर नही है, क्योंकि उसके पास से उन्हें दाता की गंध आ रही है । वह चले फिर भी गहरा ही धुआँ था,आधी दूरी तय करने पर इन लोगों में से कुछ ने हड़बड़ाकर कहा हां हां यह हिटलर ही है । वह सही कह रहे थे,यह हिटलर ही है ।

कुछ लोगों ने इनकी भी आँखों पर शक किया और घने अंधेरे में आगे बढ़ना तय किया । वह नही चाहते थे कि किसी शक और शुबहे की आड़ में वह बेहतरीन,मज़बूत और जोशीले तने खड़े उस इंसान से किनारा कर लें,जो उन्हें मुश्किल से निकालेगा, क्योंकि उसके तन से उठी जोशीली गन्ध उन्हें घुप अंधेरे में खींचे चली जा रही थी । जब काया बिल्कुल क़रीब आ गई,धुआँ बीच से छँट गया, सब स्पष्ट दिखने लगा,तो लोग बोले हां यह हिटलर ही है, हमे पहले ही मान लेना था,वह हिटलर ही था । गन्ध दुर्गंध की धोखा था,हमे मान लेना चाहिए था साथियों यह हिटलर ही था । 

दो चार ने अपनी आँखों पर भी विश्वास नही किया,दूसरों की आँखों पर भी विश्वास नही किया और कहा हम छूकर देखेंगे । कुछ कुछ प्रतीत भले हो मगर यह हिटलर नही हो सकता । हम महसूस करके देखेंगे, वह बिल्कुल नज़दीक़ गए । काया के कॉलर पर टके सितारों को छूने को हाथ बढ़ाया । काया ने उनके गले पकड़कर हवा में लटका दिया । काया का सीना इन लोगों को हवा में  टांगते फूलकर चौड़ा होता चला गया । वह लोग,जिनकी आँखे बड़ी होकर बाहर उभर आई थीं,ज़बान बाहर निकल कर लटकने लगी ,सांस लेने की आखरी कोशिश की और तड़पते हुए बोलना चाहे मगर नही बोल सके,क्योंकि काया ने उन्हें हिटलर कहने भर का भी वक़्त नही दिया....

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