{ये नज़्म १४ अगस्त की रात को लिखी और १५ अगस्त की सुबह पढ़ी। .. ये पूरी नज़्म तो नि है हा उसके कुछ अशार है जो आपके सामने रखता हु }
आज इस पार खड़ा हूँ मै
उस पार खड़े तुम भी हो
आंसू है हमारी आँखों में
तो ग़मज़दा तुम भी हो
जिगर मचलता है मेरा यहाँ
तो ज़ख़्मी दिल तुम भी हो
रोटी को ढूँढती है निगाहे
तो मुफलिस तुम भी हो
गला हमारा घुटता है यहाँ
तो अँधेरे बंद तुम भी हो
चिराग मै ढूँढता हूँ यहाँ
रौशनी के मुन्तज़र तुम भी हो
मुल्क परेशां यहाँ भी है
तो यार बीमार तुम भी हो
इस पार खड़ा हूँ मै
उस पार खड़े तुम भी हो। .. .............