Sunday, July 26, 2020

कलाम पुण्यतिथि

मौत ऐसी की मन ललचाए,ज़िन्दगी ऐसी की मिसाल बन जाए । एक इंसान,जिसका प्रारम्भ से अंत तक सब ऐसा,जैसे किसी ने बहुत सलीके से बुना हो,जैसे कोई महान इंसान को बनाने के सारे तत्व एक जगह,एक जिस्म में करीने से पिरो दिए गए हों । यही तो थे मेरे कलाम । आपको अब याद ही कर सकते हैं ।

कई दिन से कुछ भी लिखने का खास मन ही नही कर रहा,मन उचाट सा है,रह रह के आपकी ही याद आ रही थी। रह रह के भविष्य की धुँधली तस्वीर मन को बेचैन किये हैं । सबको याद है,यही 27 जुलाई थी की आप एक झटके में हमे छोड़ गए । वह नज़ारा जितना दर्दनाक था उतना ही खूबसूरत भी,भला मौत कब हमे हमारी मर्ज़ी की मिली है, आपतो चाहते ही थे कि आखरी साँस विद्यार्थियों के बीच लें और ईश्वर ने जैसे आपके लिए करीने से मौत के दरे ख़ुद बिछाए हों,जहाँ से आहिस्ता से वह आपको बुला ले और मुस्कुराते हुए आप चल दें और हम सब भीगी आँखों से यह सफर देखते रह जाए ।

जब आपसे मिला था तो यक़ीन नही था की उन यादों को इतनी बार लिखना कहना पड़ेगा।मेरे पास कुछ नही है की मैं आप पर बड़े बड़े प्रोग्राम कर पाऊँ।मैं सिसक कर रहा जा रहा हूँ की आज मेरे सबसे बड़े अध्याय की पुण्यतिथि है मगर मैं खुद उसको याद नही कर पा रहा हूँ।गुज़री रात आपके तस्वीर के साथ गुज़री थी।इतनी बार उसपर हाथ फेरा था की उंगलियो को आपके उलझे बाल महसूस होने लगे थे।

मैं पिछले कई दिन से आपसे मिलता रहा हूँ।आपकी छोटी छोटी आँखे मुझे बड़ा परेशान करती हैं।जब मैं कहता हूँ की कुछ नही हो सकता हैं तब आप सख्त हो जाते हैं।मुझे कामचोर कह कर डाँटते हैं।मैं फिर खड़ा हो जाता हूँ।कलाम साहब,नही नही मेरे कलाम,आज आपको सब याद करेंगे।इस याद के सिलसिले में मुझ गरीब की याद बड़ी मामूली सी,फीकी सी है।लेकिन हमे पता है आप सारा लावलश्कर छोड़कर मेरी यादों में ही आएँगे।डॉक्टर साहब मैं कह नही सकता आप महसूस तो कर ही रहे होंगे की हमे क्या चाहिए।आपके जाने के बाद हम सब बेहद अकेले हो गए हैं।इस अकेलेपन ने हमे अक्खड़ और बदतमीज़ बना दिया है।आज जब आप मेरे पास आइयेगा तो हमे बताइयेगा दिल मासूम कैसे होता है।हमे मिज़ाइल नही जाननी, हमे बताइयेगा मोहब्बत कैसे होती है।

हमे उड़ने की नही पहले चलने की ट्रेनिंग दीजियेगा।आपका 2020 के भारत का सपना धुन्धला न हो इसलिए हम सब लाइन लगाएं खड़े हैं।इन खड़े लोगों को एक साथ मोहब्बत से खड़े होने की दुआ दीजिये कलाम।कलाम मैं, हाँ मैं, बिलकुल अकेला,टुटा हुआ हूँ।बस एक आप हैं जो ऊपर से मुझे जोड़े हुए हैं।आखरी बात या तो वापिस आ जाइये नही तो हमे बुला लीजिये।मुझपर 27 जुलाई कयामत की तरह गुज़रती है।मैं बर्दाश्त नही कर पाता हूँ यह दिन। मुझे जीने नही देता आपका 2020 वाला सपना,कहाँ आप और हम दुनिया को वह भारत दिखाना चाहते थे,जिसे दुनिया गर्व से देखे,कहाँ हमारी नाव फिर से हिन्दू मुसलमान की मंझदार में फंस गई हैं ।

आपके एक से एक मानने वाले देखे,कड़वे से कड़वे आलोचक भी देखे मगर यह सभी भी तो सुंदर भारत बनाने में आपके साथ थे,अब यह एक दूसरे से धर्म देखकर प्यार या नफरत करते हैं । 2020 जिसमे हमे उड़ना था,हम रेंगने लगे हैं । जो चाल हमे मिलकर तेज़ दौड़कर पार करनी थी,वह हम अब उल्टी दौड़ में शामिल हो चुके हैं । हमें भविष्य का भारत बुनना था,हम भूतकाल का भारत ढूंढने में व्यस्त हो चुके हैं । हमें आज की गलतियां सुधार कर भविष्य सुन्दर करना था । हम भूतकाल की गलतियां खोजकर आज को चकनाचूर कर रहे हैं ।

देख तो कलाम आप भी रहे होंगे । खुशी हुई कि इतने कठिन वक़्त में आप नही रहे,क्योंकि यह तक़लीफ़ आपको खोखला कर देती । न्यूज़ चैनल देखकर ही आप मर जाते । मुँह से आग उगलती ज़ुबाने देख अग्नि की उड़ान को जलाकर राख कर देते ।

आज याद तो सभी करेंगे मगर आपके रास्ते पर होगा ही कौन । अब कितने दिल बचे हैं, जिनमे राम और अल्लाह साथ रह सकें । आज तो सबसे बड़े खतरे में वही लोग हैं, जो सबकी बात करते हैं, जिनका दिल किसी एक मज़हब की डोर से नही बंधा,वह ही तो आज निशाने पर हैं । आज तो कोई मनचला आप पर भी अपने मन की गंदगी उछाल देता,जब आप बोलते की मिल जुलकर रहो, सेक्युलरिज़्म आपके मुंह से निकलता और सैकड़ो मुँह आपको भर भर कर ट्रोल कर रहे होते । 

आप जरूर मरना पसन्द करते यह सुनकर की कोई एंकर राष्ट्रीय मीडिया में प्राइम टाइम पर बैठकर खुद को कम्युनल कहे और इसपर गर्व करे । यह सब हम देख रहे हैं, यही हमारी सज़ा है कलाम और यही आपका पुण्य की मनहूस दिन देखने से पहले चले गए । बस यही प्रार्थना की यह दिन सुधरे वरना हम ही सिधार जाएँ और आपके पैतयाने बैठकर 2020 के भारत पर पेंसिल फेरते फेरते रोते रहें...नमन नही कहेंगे, क्योंकि कलाम मरा नही करते हैं, जब तक सपना अधूरा है, तब तक कलाम जा भी नही सकते....
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Tuesday, July 21, 2020

शीला दीक्षित

अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार। यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को अस्पताल के कर्मचारी ले जा रहे हैं। उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं। ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं। मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।

इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है। हर जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था। यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।

अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है। ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दिखता है ना की उसका धर्म। मरीज़ को डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता है ना की उसमे धर्म। जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं। ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है। तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं। मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।

यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं। उसके सीने पर सर रखकर आंसुओ के सहारे खुद को हल्का कर लेते हैं । इस मौके पर धर्म का दखल नही होता बल्कि संवेदनाओं का पहरा होता है, जब संवेदना सर उठाती है, तो धर्म पिघल जाता है ।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह अपने परिवार की रीढ़ था। 

जो एक पल में इंसानों का सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ। अक्सर एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी होते होंगे और उसी में दँगे करने वाले के अपने सगे भी लेटे होंगे। हो सकता है न यह संयोग। मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।

मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।आजकल तो कोरोनाकाल में आप अपने मरीज़ को भी नही देख सकते,एक बेबसी है, जिसमें कोई शामिल नही । सबका दर्द एक जैसा है मगर अलग अलग,कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर भी रखकर नही रो सकता । हम तो कहते हैं कि मरने,मिटने से पहले इंसानियत सीख लो,एक दिन नही रहेंगे हम सब,मगर हमारी छाप सभ्यता पर ज़रूर पड़ेगी । नफरत की छाप नफरत बनकर गूँजेगी और प्रेम की छाप प्रेम बनकर हवा में भीनी भीनी घुल जाएगी । तुमसे कहते हैं कि दिल में संवेदना लाओ,अस्पतालों को देखो,उनमें से टूटते हुए लोगों को देखो और सम्भल जाओ । बस यही दुआ की आपको ज़िन्दगी के फ़लसफ़े सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो.....
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अस्पताल बोलते हैं

अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार। यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को अस्पताल के कर्मचारी ले जा रहे हैं। उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं। ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं। मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।

इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है। हर जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था। यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।

अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है। ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दिखता है ना की उसका धर्म। मरीज़ को डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता है ना की उसमे धर्म। जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं। ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है। तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं। मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।

यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं। उसके सीने पर सर रखकर आंसुओ के सहारे खुद को हल्का कर लेते हैं । इस मौके पर धर्म का दखल नही होता बल्कि संवेदनाओं का पहरा होता है, जब संवेदना सर उठाती है, तो धर्म पिघल जाता है ।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह अपने परिवार की रीढ़ था। 

जो एक पल में इंसानों का सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ। अक्सर एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी होते होंगे और उसी में दँगे करने वाले के अपने सगे भी लेटे होंगे। हो सकता है न यह संयोग। मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।

मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।आजकल तो कोरोनाकाल में आप अपने मरीज़ को भी नही देख सकते,एक बेबसी है, जिसमें कोई शामिल नही । सबका दर्द एक जैसा है मगर अलग अलग,कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर भी रखकर नही रो सकता । हम तो कहते हैं कि मरने,मिटने से पहले इंसानियत सीख लो,एक दिन नही रहेंगे हम सब,मगर हमारी छाप सभ्यता पर ज़रूर पड़ेगी । नफरत की छाप नफरत बनकर गूँजेगी और प्रेम की छाप प्रेम बनकर हवा में भीनी भीनी घुल जाएगी । तुमसे कहते हैं कि दिल में संवेदना लाओ,अस्पतालों को देखो,उनमें से टूटते हुए लोगों को देखो और सम्भल जाओ । बस यही दुआ की आपको ज़िन्दगी के फ़लसफ़े सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो.....
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Friday, July 3, 2020

विवेकानंद

जब तक आपको मूर्ति में भगवान दिख रहें है तब तक आप ईश्वर से मिलने की पहली ही सीढ़ी पर हैं। जैसे ही ईश्वर मूर्ति से आज़ाद हो जाए वह दूसरी सीढ़ी है और जब यह आपमें दिखने लग जाए तो यह अंतिम सीढ़ी है।आप किसी भी सीढ़ी को नकार नही सकते,कमतर नही समझ सकते,हाँ अपनी समझ के साथ आप आगे बढ़ते हैं।यह लफ्ज़ हमारे नही हैं।यह वह गहराई के अल्फ़ाज़ हैं जो मेरे कान हमेशा सुनते रहे हैं।दिल ने हमेशा आपके हर लफ्ज़ को उतारा है। मैं सोचता हूँ की आप पर लिखने का साहस भला कैसे लाऊं ।

आप पर मैं लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था। अब आप सामने हैं, तो सबकुछ दिखने लगा है । आपका यौवन ओढ़े गम्भीर चेहरा अजब सी रौशनी पैदा करता है।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे अकेले घंटों बातें की तब खुद को समझ सका।वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।

मेरी ज़िन्दगी को हर घङी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप ,वही तो थे नरेंद नाथ दत्त जी यानि हमारे विवेकानन्द। महान संत रामकृष्ण परमहँस की छाँव से निकले मेरे विवेकानंद । देखिये आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बङा फ़र्क है।
आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखायाऔर दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे। आपने हमे सवाल करने का साहस दिया,अगर आपके सवाल नही होते तो रामकृष्ण परमहँस के वह उत्तर,जिनसे आपके दिल की गांठ खुली,कभी न खुलती । लोग सवाल से भागते हैं, उनके पास उत्तर नहीं, आपने सवाल पूछना और उत्तर देना दोनों हमे सिखाया । आपने दूसरों को नीचा दिखाने से ज़्यादा खुद को ऊंचा उठाना हमे सिखाया,यही तो सत्य का रास्ता है, जो झूठ का ज़िक्र नही करता,बल्कि खुद खुल जाता है, जो झूठ होगा वह खुद बखुद खत्म हो जाएगा,सत्य को झूठ की चर्चा से बचना होगा । मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें 39 साल की मामूली सी उम्र में जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं, पार करना तो सोचे भी ना।

हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ ।तब से मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।लिखने को तो बहुत से किस्से याद आ रहे,आखरी वक़्त पर बिस्तर पर पड़े बीमार चिड़चिड़े विवेकानंद को लिख सकता हूँ,दुनिया को रौशनी देता हुआ चमकदार विवेकानंद लिख सकता हूँ,परमहंस के सामने अपने दिल को खोलते विवेकानंद को लिख सकता हूँ,आध्यत्म और सेवा में सेवा को प्रमुखता देते विवेकानंद पर लिख सकता हूँ । दूसरों से नफरत और प्रेम में अथाह प्रेम पकड़े विवेकानंद पर लिख सकता हूँ  मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं । सारी दुनिया फख्र करे की हमारे पास विवेकानन्द हैं और मै फख्र करू क्योंकि अपनें दोस्त की ज़मीन पर पैदा हुआ हूँ। विवेकानंद जैसे चरित्र एक धर्म के डोर में नही बंधते, बल्कि उनपर हर एक का अधिकार होता है । रौशनी किसी एक के लिए कभी होती भी नही,वह तो हर आँख वाले के लिए होती है ।

 आज लोग कहते हैं कि विवेकानंद की पुण्यतिथि है, जबक हम कहते हैं कि आज वह ज़मीन की बेड़ियाँ तोड़कर पूरे संसार के सफर पर निकल गए थे,एक घर से आज़ाद होकर हर शरीर के घर यानी हृदय में रहने निकल गए थे । मेरे लिए विवेकानंद एक रोशनी है, जो मेरा सफर खत्म किये बिना भला खत्म कैसे हो सकते हैं...पढ़िए उन्हें,इतना पढ़िए की दिल सख्त से मुलायम होने लगे,फिर जीवन मे इतना उतारिये की आपमें नफरत दम तोड़ दे,जबतक नफरत,अहंकार है तब तक विवेकानंद सिर्फ जीभ पर आएँगे,कंठ से नीचे नही जाएँगे,उनका स्वाद जो मस्तिष्क को निर्देशित करेगा ,आप ले ही नही सकेंगे जब तक हृदय विशाल नही होगा । उसको पाने के लिए सबसे प्रेम आवश्यक है,तो मर्ज़ी आपकी चाहे जीभ पर नाम जपिये चाहे उन्हें शरीर मे धारण करने तरफ बढ़िए....

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